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किस कानून के चलते राहुल गांधी की गई संसद सदस्यता, क्या लड़ पाएंगे 2024 चुनाव? जानें अब क्या है कानूनी विकल्प

राहुल गांधी को मोदी सरनेम केस में संसद से अयोग्य करार दिया जाना उनके लिए एक बड़ा झटका है. सूरत सेशंस कोर्ट की तरफ से दोषी करार दिए जाने के एक दिन बाद उन्हें संसद सदस्यता से अयोग्य करार दिया गया है. इसके बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर अब राहुल गांधी के पास अब क्या कानूनी विकल्प है? क्या राहुल गांधी की संसदीय सदस्यता वापस बहाल की जा सकती है और क्या कब वे अगला चुनाव लड़ सकते हैं? ये इस वक्त राहुल गांधी के सियासी करियर को लेकर ऐसे सवाल हैं जो सभी के मन में जरूर उठ रहे होंगे. तो आइये आपको तफसील से बताते हैं कि राहुल के पास बचने के लिए क्या-क्या कानूनी प्रावधान बचे हुए हैं.

दरअसल, जब मजिस्ट्रेट कोर्ट ने उनको सजा दी और उसके साथ 30 दिनों का स्टे भी दिया था कि आप अपील कर सकते हैं. लेकिन ये नहीं पता है कि केवल बेल दिया गया है या फिर स्टे भी किया गया था. इसे देखने की जरूरत है. चूंकि, 2013 में लिली थॉमस बनाम इंडिया मामले की सुनवाई के दौरान जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के सेक्शन (8) और सब सेक्शन (4) को चैलेंज किया गया था कि ये असंवैधानिक है. इसके तहत जो है सिटिंग MP और MLA को 3 महीने का समय दिया जाता था कि वो अपील कर सकते थे और इतने दिनों तक उनकी सदस्यता बरकरार रहती थी, लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दे दिया था. कोर्ट ने कहा था कि अगर 2 साल की सजा होती है तो आपकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म कर दी जाएगी.

लिली थॉमस बनाम इंडिया केस बना नजीर

ये लिली थॉमस बनाम इंडिया के मामले में ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था. लेकिन ये भी बात है कि आपके पास सब्सटेंटिव राइट है अपील करने करने के लिए कि अगर कोई भी कोर्ट आपको सजा सुनाती है तो आपके पास उसके खिलाफ अपील के अधिकार हैं. अगर कोई कोर्ट उसके कन्विक्शन पर रोक लगा देती है तब उसकी सदस्यता नहीं जाएगी.

जो सदस्यता रद्द हुई है वो संवैधानिक मर्यादाओं के अनुसार किया गया है. इसमें कोई तीन-पांच नहीं है. लेकिन इतनी जल्दी हो गई तो ये काम तो लोकसभा सचिवालय और सरकार का है.  इस पर किसी तरह का कोई प्रश्न नहीं खड़ा किया जा सकता है कि ये नहीं होना चाहिए था. लोकसभा ने क्यों कर दिया या किसी तरह से इन्हें अपील करने का टाइम देना चाहिए था. कानून में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत उनको अपील करने का समय दिया जाता..

चूंकि अपील करने का जो समय दिया जाता था वो तो असंवैधानिक करार दिया जा चुका है. अगर कोर्ट ने राहुल गांधी के कन्विक्शन पर कोई स्टे नहीं दिया था और इनकी सदस्यता चली गई तो ये निश्चित रूप से ये कानूनी तौर पर सही है. कोई गलती नहीं हैं. चूंकि जब कानून में ये स्पष्टता है तो फिर किसी भी तरह का कोई मोटिव नहीं देखना चाहिए. लोकसभा ने जो कार्रवाई की है वो बिल्कुल पूर्ण सम्मत है. कानूनी रूप से अगर देखें तो राहुल गांधी इस फैसले को चैलेंज कर सकते हैं लेकिन जहां तक कानूनी प्रावधान की बात है तो कोर्ट ही इसका निर्णय लेगा. चूंकि हर व्यक्ति को कानूनी तौर पर अपील करने का अधिकार है.  

राहुल को बड़ा राजनीतिक नुकसान
 
कोर्ट के फैसले और संसदीय सदस्यता जाने का राजनीति नुकसान तो बहुत बड़ा है. अब चूंकि उनकी सदस्यता खत्म हो गई है तो अब तो सुप्रीम कोर्ट या कोई भी कोर्ट उनकी सदस्यता का रिइनस्टेटमेंट तभी कर सकता है जब कोई कानूनी तौर पर उसमें कमजोरी हो. लेकिन मुझे तो नहीं लगता है कि इस मामले में इन्हें अब कोई राहत मिल पाएगी. इसका एक मात्र कारण ये है कि इस मामले में कानून का कोई उल्लंघन नहीं किया गया है. चूंकि ये आदेश तो सुप्रीम कोर्ट का ही था और जो आदेश होता है वो कानून होता है.

जब कानून का उल्लंघन होता है तब निश्चित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय उस पर रोक लगा सकती थी. लेकिन इस मामले में लोकसभा सेक्रेटेरिएट कानून सम्मत कार्रवाई की है.  राहुल गांधी को कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. अब ये चुनाव में जीत हासिल करके ही सदस्य बन पाएंगे और दूसरा कोई विकल्प नहीं है. अपील करने का इनको अधिकार है लेकिन उसका अर्थ ये नहीं है कि हर अधिकार आपको मिल ही जाए. कानूनी रूप से अगर कोई निर्णय सही है तो फिर इन्हें आगे अभी राहत नहीं मिलेगी.

ऐसा है कि अगर इस कॉन्विक्शन में इन्हें स्टे नहीं मिला तो ये 6 वर्षों तक कोई भी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. चूंकि इसके कानूनी प्रावधान में ये कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति सिटिंग MLA और MP है और अगर उसको कन्विक्शन हो जाता है तो जिस तारीख से उसे दोषी करार दिया गया है, उसी दिन से अगले 6 वर्षों तक वह चुनाव नहीं लड़ सकेगा. ये कानून है. लेकिन ये तो अभी आगे की प्रक्रिया है.

जनप्रतिनिधित्व कानून (Public Representative Act) के अंदर जो सेक्शन (8) और सब-सेक्शन (3) है वो बड़ा ही स्पष्ट है. इसके मुताबिक अगर किसी MP या MLA को 2 साल तक की सजा होती है तो उसकी सदस्यता तुरंत चली जाएगी.

चूंकि एक लॉयर और ऑफिसर ऑफ द कोर्ट होने के नाते मुझे तो यह नहीं लगता है कि इस मामले में कुछ हो सकता है. लेकिन, एक बात है कि अगर सेशन कोर्ट ने फैसला सुनाने के बाद सजा के आदेश पर रोक लगा दी थी और उसके बावजूद ये सारी चीजें हुई हैं तब तो गलत है. अगर कोर्ट ने यह कहा होगा कि आप 30 दिनों में अपील करें और तब तक आपकी सजा को कैंसिल किया जाता है तब अगर लोकसभा ने ऐसी कार्रवाई की होगी तो इसे गलत ठहराया जाएगा. लेकिन अगर ऐसा नहीं है तब ये पूरी तरह से सही है और अब जब इनकी सदस्यता चली गई तो अब इनके पास सिर्फ चुनाव लड़ने का ही विकल्प है.  

जहां तक सदस्यता जाने की बात है तो इसे तो अलग से चैलेंज किया जाएगा कि क्या जो लोकसभा ने राहुल गांधी की सदस्यता खत्म की है वो सही है या गलत है. पहले जो 3 महीने का समय अपील करने का मिलता था उसे तो सुप्रीम कोर्ट ने ही रद्द कर दिया था. जिस वक्त इस कोर्ट ने असंवैधानिक करार दे दिया था उस वक्त कोर्ट में इसे रिव्यू के लिए भी गए थे. लेकिन कोर्ट ने उस रिव्यू अपील को भी खारिज कर दिया था. पूरे देश को याद होगा कि इसी रिव्यू की कॉपी को राहुल गांधी ने सबके सामने फाड़ दी थी. जब इन्होंने बिल लाने की कोशिश की थी इससे बचने के लिए सदस्यता तुरंत समाप्त नहीं होनी चाहिए तो राहुल गांधी ने अध्यादेश की कॉपी ही फाड़ दी थी.

(ये लेखक के निजी विचार है)

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