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BLOG : तीन तलाक के सहारे कहीं और है मोदी सरकार का निशाना!

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार चल रही सुनवाई अचानक भटकती नजर आने लगी है. सोमवार को केंद्र की मोदी सरकार की तरफ से पेश हुए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट से तीन तलाक के अलावा मुस्लिम समाज में प्रचलति तलाक के दूसरे तरीकों को भी खत्म करने की मांग की है. उन्होंने कहा सुप्रीम कोर्ट से निकाह हलाला और बहुविवाह पर भी सुनवाई का विकल्प खुला रखने की अपील की है. उनकी अपील को सुप्रीम कोर्ट ने मान भी लिया. हालांकि पहले सुप्रीम कोर्ट ने इन पर सुनवाई से मना किया था.

सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार का रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस रुख से एकदम उलट है जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से कुछ दिन पहले जाहिर किया था. उन्होंने कहा ता कि तीन तलाक के मसले के हल के लिए मुस्लिम समाज खुद आगे आए. उस दिन अपने बयान में प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई थी कि मुस्लिम समाज से ठीक उसी तरह लोग आगे आएंगे जैसे किसी जमाने में राजा राम मोहनराय जैसे लोगों ने आगे आकर हिंदू समाज में सती प्रथा का अंत किया था. आश्चर्य इस बात को लेकर है कि सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखते वक्त प्रधानमंत्री की ये उम्मीद हवा क्यों हो गई. केंद्र सरकार के वकील का सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम समाज में तलाक से सभी तरीकों के रद्द करने की अपील केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती है. गौरतलब है कि सायरा बानो ने अपनी याचिका में सिर्फ एक साथ तीन तलाक के साथ निकाह हलाला और बहुविवाह को चुनौती दी है. सुनवाई के पहले ही दिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था कि वो सिर्फ एक साथ तीन तलाक पर ही सुनवाई करेगा हलाला और बहुविवाह पर नहीं. मुस्लिम समाज ने इस फैसले का दिल खोल कर स्वागत किया था. इससे समाज में बन रही ये धारणा भी टूटी थी कि सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों के निजी कानूनों में दखलंदाज़ी कर रहा है. अब केंद्र की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों मामलों पर भी सुनवाई का विकल्प खोल लिया है. इससे मुस्लिम समाज में फिर से ये आशंका घर कर रही है कि केंद्र सरकार तीन तलाक को खत्म करने के बहाने देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का रास्ता खोज रही है. सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील के तौर पर पेश हुए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने तीन तलाक को पूरी तरह संविधान के खिलाफ बताया. उन्होंने कहा कि ये महिलाओं के समानता, लैंगिक समानता और मानवाधिकार के भी खिलाफ है. उन्होंने कहा कि कोई भी पर्सनल लॉ हो या प्रथा, उसे संविधान की कसौटी से गुजरना होगा. पर्सनल लॉ की भी समानता के अधिकार, लैंगिक समानता के अधिकार से तुलना होनी चाहिए. किसी भी महिला को दूसरे समुदाय की महिलाओं के समान हक होना चाहिए. उन्होंने तर्क दिया कि तलाक के मामले में मुस्लिम समाज में महिलाओं के अधिकार पुरुषों की तुलना में कम हैं. देश में अन्य समुदायों की महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार हासिल नहीं है. दुनिया के उन इस्लामिक देशों की महिलाओं के मुकाबले भी भारत में मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के अधिकार कम हैं, जहां शादी और तलाक को लेकर रिफॉर्म के तौर पर कानून बनाया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने रोहतगी से पूछा अगर मुस्लिम समाज में प्रचलित तलाक की मौजूदा प्रथा खत्म कर दी जाए तो तलाक के लिए मुस्लिम पुरुषों के पास क्या विकल्प रहेगा. इस पर मुकुल रोहतगी ने कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कोई गुंजाइश नहीं छोड़ेगी. अगर सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह को रद्द कर देता है तो केंद्र इस पर कानून बनाने को तैयार है. शादी और तलाक का धर्म या धार्मिक प्रथा से कोई लेना देना नहीं. किसी के जीवन को भला कैसे नियंत्रित किया जा सकता है. कोर्ट पवित्र कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब या गीता की व्याख्या करने के लिए नहीं है. उन्होंने कहा कि तीन तलाक अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा बेहद संवेदनशील मुद्दा है. पुरानी सरकारें इस पर कानून नहीं बना पाईं लेकिन मौजूदा सरकार इससे पीछे नहीं हटेगी. तीन तलाक की वजह से मुस्लिमों में आधी आबादी असहाय महसूस कर रही है. BLOG : तीन तलाक के सहारे कहीं और है मोदी सरकार का निशाना! सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की मोदी सरकार के रुख से साफ है कि वो तीन तलाक पर कानून बनाने का मन बना चुकी है. इसके संकेत खुद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में बोलते हुए दिए. मोदी सरकार के तीन साल की उलब्धियों पर हुए इस कार्यक्रम में उनसे पूछा गया था कि उत्तर प्रदेश के चुनाव को दौरान तीन तलाक पर प्रधानमंत्री ने मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ दिलाने की बात कही थी और बाद में उन्होंने मुस्लिम समाज से ही इस पर कोई रास्ता निकालने को कहा. उनके कौन से बयान को सही माना जाए. इस पर रविशंकर प्रसाद ने दो टूक कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने दीजिए. फैसला आने दाजिए. फिर देखिए सरकार क्या करती है.

जब रविशंकर प्रसाद इस कार्यक्रम में बोल रहे थे उस समय अटार्नी जनरल सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रख रहे थे. कानून मंत्री ने इस मुद्दे पर लगभग वही बातें कहीं जो सरकार के वकील सुप्रीम कोर्ट में कह कर आए हैं. तीन तलाक पर रोक की बात तो समझ में आती है. तमाम इस्लामी विद्वान और मुस्लिम संगठन इसे बिदअत मानते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ इसे जारी रखना चाहते हैं वहीं कुछ इसे खत्म करन चाहते हैं. शरीयत में भी इसे तलाक-ए-बिदअत कहा गया है. वहीं तलाक के दूसरे तरीके यानि तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन पर कोई विवाद नहीं है. किसी ने इन्हें चुनौती भी नहीं दी है. तमाम उलेमा का मानना है कि तलाक देने में ये ही तरीके अपनाए जाने चाहिएं. ये वही तरीका है जो कुरआन मे बताया गया है. केंद्र सरकार की सुप्रीम कोर्ट से इन पर भी गौर करके इन्हें भी खत्म करने की अपील करना खतरनाक साबित हो सकता है. मोदी सरकार का ये कदम ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की इस आशंका को सच साबित करता नजर आने लगा है कि केंद्र सरकार मुसलमानों के निजी मामलों में गैरजरूरी तौर पर दखल दे रही है. मुस्लिम समाज तीन तलाक के मामले में पहले से ही बंटा हुआ हैं. समाज का बड़ा हिस्सा तीन तलाक के मसले पर केंद्र सरकार से टक्कर लेने वाले मुस्लिम संगठनों के साथ खड़ा है. दूसरा तबका एक साथ तीन तलाक को खत्म करके इसकी जगह कुरआन में बताए गए तरीके को अमल लाने पर जोर देने वालों के साथ है. इसी को मुस्लिम कानून यानि शरीयत में तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन कहा गया है. अगर केंद्र सरकार तलाक के सारे तरीकों को ही गैर संविधानिक घोषित करने पर तुल गई है तो ऐसे में मुसलमानों के लिए धार्मिक आज़ादी का सवाल सबसे आगे आकर खड़ा हो जाएगा. इससे मुस्लिम समाज में सुधार की दिशा में कदम उठने वाले कदम पीछे हट सकते हैं. मुस्लिम समाज में सुधार की कोशिशों को धक्का लग सकता है. समाज पर कट्टरपंथी सोच हावी हो सकती है. ये स्थिति मुस्लिम समाज के साथ देश के लिए भी अच्छी नहीं होगी. केंद्र सरकार को इस मामले में बहुत सोच समझ कर कदम बढ़ाना होगा. कई मुस्लिम संगठन तीन तलाक के मुद्दे पर केंद्र सरकार के साथ टकराव का रास्ता अपनाए हुए हैं. हफ्ते भर पहले प्रधानमंत्री के बयान से बर्फ पिघली थी. अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष देखकर लगने लगा है कि वो खुद मुस्लिम संगठनों को टकराव की दावत दे रही है. एक तरफ प्रधानमंत्री मुसलमानों से तीन तलाक पर राजनीति नहीं करने देने की अपील करते हैं वहीं उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट में मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली बात कहती है. इससे लगता है कि प्रधानमंत्री को मुस्लिम महिलाओं से कहीं ज्यादा इस मुद्दे के बहाने अपने वोटबैंक के एकजुट रखने का चिंता है. सरकार इस मुद्दे पर उतनी गंभीर नहीं लगती जितना वो दिखना चाह रही है. उसकी नीयत शक के दायरे में है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आकड़ें लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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