आज मोबाइल पर वीडियो देखने या सोशल मीडिया चलाने से लेकर रोज के जरूरी कामों तक कई चीजों के लिए लोग इंटरनेट पर निर्भर हैं. ऐसे में जब किसी इलाके में इंटरनेट बंद कर दिया जाता है, तो वहां रहने वाले लोगों का ऑनलाइन दुनिया से संपर्क टूट जाता है. हाल ही में दिल्ली के कुछ हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने का मामला सामने आया.
अधिकारियों ने इसे सुरक्षा से जुड़ा कदम बताया. इस घटना ने एक बार फिर भारत में इंटरनेट शटडाउन को लेकर चर्चा तेज कर दी है. ऐसे में आइए जानते हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा इंटरनेट शटडाउन कहां होता है और भारत का क्या हाल है.
दुनिया में सबसे ज्यादा इंटरनेट शटडाउन कहां होता है?
दुनिया में इंटरनेट शटडाउन के मामलों में म्यांमार पहले और भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि पाकिस्तान तीसरे स्थान पर है. साल 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक इंटरनेट शटडाउन में भारत की हिस्सेदारी 21 फीसदी रही, हालांकि पिछले सालों के मुकाबले इसमें कमी आई है, लेकिन भारत में इंटरनेट बंद होने की घटनाएं अब भी दर्ज की जा रही हैं. साल 2016 से 2025 के बीच देश में सबसे ज्यादा इंटरनेट शटडाउन जम्मू-कश्मीर में हुए, जबकि विरोध प्रदर्शन 2025 में इंटरनेट बंद किए जाने की सबसे बड़ी वजह रही.
इंटरनेट शटडाउन में भारत का क्या हाल है?
भारत में इंटरनेट शटडाउन के मामलों में पिछले कुछ सालों के दौरान कमी आई है, लेकिन यह समस्या अभी भी बनी हुई है. इंटरनेट शटडाउन का मतलब किसी क्षेत्र में अस्थायी रूप से इंटरनेट सेवाएं बंद करना है. साल 2016 में दुनियाभर में हुए इंटरनेट शटडाउन में भारत की हिस्सेदारी 35 फीसदी से ज्यादा थी, जो 2020 में बढ़कर 60 फीसदी से ज्यादा हो गई. इसके बाद इसमें गिरावट दर्ज की गई और 2022 में यह 41 फीसदी, जबकि 2025 में घटकर 20 फीसदी से ज्यादा रह गई. वैश्विक स्तर पर इंटरनेट बंद होने की घटनाओं में भारत की हिस्सेदारी कम हुई है, लेकिन देश में ऐसे मामले अब भी सामने आ रहे हैं.
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भारत में इंटरनेट शटडाउन की सबसे बड़ी वजह क्या है?
भारत में इंटरनेट शटडाउन की सबसे बड़ी वजह विरोध प्रदर्शन रही है. साल 2025 में इंटरनेट बंद किए जाने के कुल मामलों में 45 फीसदी से ज्यादा घटनाएं विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी थीं, जबकि 2021 में यह आंकड़ा 10 फीसदी से भी कम था. वहीं सांप्रदायिक हिंसा के कारण इंटरनेट बंद किए जाने की हिस्सेदारी भी 2021 के 6 फीसदी से बढ़कर 2025 में करीब 25 फीसदी हो गई.
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