Humans Blindly Trusting AI Chatbots: एआई के आने से इंसानों की प्रोडक्टिविटी बढ़ी है और अब वो कई काम जल्दी कर सकते हैं. एआई के कारण अब कई मुश्किल काम आसान भी हो गए हैं. हालांकि, इस बीच एक चिंता वाली बात भी निकल सामने आई है कि एआई इंसानों को आलसी बना रही है. अब लोग अपना लॉजिक यूज न कर एआई चैटबॉट्स पर आंख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं. पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी की रिसर्च में बताया गया है कि जैसे-जैसे एआई चैटबॉट्स का यूज बढ़ रहा है, लोग अपनी समझ छोड़कर सिर्फ एआई चैटबॉट्स पर भरोसा कर रहे हैं.

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गलत जवाबों पर भी किया जा रहा भरोसा

रिसर्च में इंसानों के अपनी समझ छोड़कर एआई पर भरोसा करने के बिहेवियर को 'कॉग्नेटिव सरेंडर' कहा गया है. यह एक टेंडेंसी है, जिसमे इंसान बिना ज्यादा सोचे-समझे एआई के जवाबों को स्वीकार कर लेते हैं, भले ही वो सटीक न हो. रिसर्च में कहा गया है कि लग अब रीजनिंग को मशीनों को आउटसोर्स कर रहे हैं और एआई पर उनकी निर्भरता बढ़ती जा रही है. जब एआई चैटबॉट सवाल पूछते ही कॉन्फिडेंस से जवाब देते हैं तो ज्यादातर लोग उसे स्वीकार कर लेते हैं.

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झूठा कॉन्फिडेंस बना रही है एआई 

स्टडी में शामिल होने वाली जिन पार्टिसिपेंट्स ने एआई का यूज किया, वो अपने जवाबों को लेकर ज्यादा कॉन्फिडेंट थे, भले ही उनका चैटबॉट आधे सवालों के गलत जवाब दे रहा था. इससे पता चलता है कि एआई न सिर्फ डिसीजन मेकिंग पर असर डाल रही है बल्कि यह लोगों में झूठा कॉन्फिडेंस भी पैदा कर रही है.

चापलूसी भी करते हैं एआई चैटबॉट्स

एआई चैटबॉट्स के बिहेवियर को लेकर अलग-अलग रिसर्च हो रही है. कुछ समय पहले सामने आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि एआई चैटबॉट चैटजीपीटी यूजर की बातों से असहमति की जगह कई गुना सहमति जताता है. यह यूजर को नो कहने की तुलना में 10 गुना अधिक यस कहता है. बातचीत में बहुत ही कम ऐसे मौके आते हैं, जब चैटबॉट यूजर की किसी बात से असहमत होता है. इस वजह से कई चिंताएं उठ रही हैं कि यह चैटबॉट गलत या भ्रामक जानकारी को फैला सकता है. 

और भी चिंताएं आईं सामने

एआई सिस्टम को लेकर चिंता वाला यह पहला पैटर्न नहीं है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और सेंटर फॉर डेमोक्रेसी एंड टेक्नोलॉजी की एक रिपोर्ट में पता चला था कि एआई चैटबॉट कमजोर यूजर को बचा नहीं पाते हैं. ये कई बार यूजर को खुद को नुकसान पहुंचाने की टिप्स भी देते हैं. 

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