बीजेपी की एक अहम वर्कशॉप में पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे का दर्द खुलकर सामने आया. मंच से बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर किसी कार्यकर्ता की एक घंटी में अफसर का फोन नहीं उठता और उसका काम नहीं होता, तो अफसरों को भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. उनका कहना था कि कार्यकर्ता पार्टी का एंबेसेडर है और उसके साइन से काम होना चाहिए.

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वसुंधरा राजे ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि हमारे कार्यकर्ता की आवाज प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की आवाज है. कार्यकर्ता की उपेक्षा किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएगी. उन्होंने दो टूक कहा कि भाजपा बिना कार्यकर्ता के प्राणविहीन है, इसलिए बूथ अध्यक्ष से लेकर मंडल और जिलाध्यक्ष तक सभी पार्टी के एंबेसेडर हैं और उन्हें मजबूत करना ही होगा.

शेर के जरिए जताई संवेदना

अपने संबोधन में वसुंधरा राजे ने कार्यकर्ताओं के लिए एक शेर भी पढ़ा, जिसने माहौल को भावुक कर दिया, “किसी रोते हुए चेहरे से आंसू पूछ तो सही, किसी बेसहारा की लाठी बन तो सही. कहीं मत कर तलाश, इसी जमीं पर है ईश्वर, किसी के जख्म पर मरहम लगा तो सही.”

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विपक्ष को मिला मुद्दा

वसुंधरा राजे के बयान पर विपक्ष ने भी तुरंत हमला बोल दिया. विधानसभा में विपक्ष के नेता टीकाराम जूली ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि मौजूदा सरकार में आम जनता ही नहीं, बीजेपी के कार्यकर्ताओं की भी सुनवाई नहीं हो पा रही है. उनके मुताबिक मामला इतना गंभीर है कि खुद बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष को मंच से यह बात कहनी पड़ी.

इसी वर्कशॉप में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को भी कहना पड़ा कि कार्यकर्ता ही बीजेपी की असली ताकत है. लेकिन हैरानी की बात तब सामने आई जब मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी प्रेस नोट में वसुंधरा राजे का नाम तक नहीं था.

प्रेस नोट में संगठन महामंत्री बीएल संतोष और प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का जिक्र तो था, लेकिन वसुंधरा राजे को अन्य पदाधिकारी की श्रेणी में भी नाम से शामिल नहीं किया गया. अब वसुंधरा राजे के बयान, विपक्ष के हमले और प्रेस नोट में उनके नाम के न होने को लेकर सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या कार्यकर्ताओं की अनदेखी सच में बढ़ गई है और क्या पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा.