हमारे देश में परंपराओं और रिवायतों को शिद्दत से निभाने की अनूठी परंपरा है और जब बात विजयदशमी की हो तो फिर बुराई के प्रतीक को मारने की परंपराएं अपने आप में खास हो जाती हैं. ऐसी ही अनूठी परंपरा कोटा में निभाई जाती है जहां, जेठी समाज मिट्टी के बनाए गए रावण को पेरों से रौंदते हैं.
हालांकि जेठी समाज की हाड़ौती में संख्या बहुत कम है लेकिन विजयदशमी पर जेठी समाज रावण का वध अलग तरीके से करके अपनी मौजूदगी दर्ज करवा देता है. कोटा के नांता इलाके में जेठी समाज के लोगों ने हर साल की तरह इस साल भी मिट्टी का रावण बनाकर उसको पैरों से रोंदकर बुराई के प्रतीक का का अंत किया गया.
पेशेवर पहलवान निभाते हैं परंपरा
रावण बहुत बड़ा तो नहीं बनाया गया है लेकिन पेशेवर पहलवान जाति के लोगों की पुरानी परंपरा है कि जेठी समाज के लोग नवरात्रा के शुभारंभ में ही मंदिर में मिट्टी का रावण बनाते हैं और बुराई के प्रतीक को आज यानी दशमी के दिन पैरों से रौंदकर उस मिटटी पर पहलवान जोर-अजमाइश कर विजयदशमी का पर्व कुछ इस अंदाज में मनाते हैं.
मिट्टी से रौंदकर करते हैं रावण का वध
गुरुवार को दशहरे के मौके पर हर साल की तरह इस साल भी मिट्टी के रावण को पैरों से रौंद कर उसका वध किया गया. और फिर इसी मिट्टी पर पहलवानों ने जोर आजमाइश कर सालों पुरानी जेठी समाज की रिवायत को विजयदशमी के मौके पर निभाया.
नवरात्र के 9 दिन तक परंपरागत अंदाज में महिलाएं गरबा नृत्य करती हैं. कलश में दीपक जलाकर यह नृत्य किया जाता है जो जाति समाज की सालों पुरानी संस्कृति का हिस्सा है और नई पीढ़ी भी इसको बखूबी शिद्दत के साथ निभा रही है.
150 साल से चली आ रही परंपरा
दरअसल, हाड़ौती में हाड़ा राजाओं का शासन था और राजाओं को कुश्ती देखने का बड़ा शौक था. यही वजह है करीब 150 साल पहले यहां के राजा कुछ पहलवान गुजरात से कोटा बुलवाते थे और उनकी कुश्ती करवाई जाती थी. यह सिलसिला सालों तक चलता रहा और जेठी समाज का कुनबा भी बढ़ता गया और यही पहलवान जाति जो दंगल करने के नाम से जानी जाती है.
दूर-दूर से देखने आते हैं लोग
पहलवान आज के दिन उसी शिद्दत से कुश्ती करते है जैसे उनके पूर्वज करते आ रहे थे. बुराई के प्रतीक को पैरों से रौंदने की इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए बड़ी तादाद में स्थानीय निवासी और जेठी समाज की महिलाएं और बच्चे भी इस आयोजन में शामिल होने दूर दूर से आते है.