जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने राज्य की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है, जिसमें दो दशक से भी अधिक समय पहले कुपवाड़ा जिले में हुए एक घातक फिदायीन हमले में भूमिका के लिए एक पूर्व पुलिस स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है.
कोर्ट ने एक अन्य आरोपी को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा, जो 2011 से न्यायिक प्रणाली में लंबित एक मामले में मिश्रित परिणाम दर्शाता है. जज संजीव कुमार और जज संजय परिहार की खंडपीठ ने 30 अगस्त, 2025 को यह फैसला सुनाया, जिसमें सोगाम पुलिस स्टेशन के तत्कालीन SHO गुलाम रसूल वानी को निचली कोर्ट से बरी किए जाने के फैसले को पलट दिया गया.
वानी को आजीवन कारावास
वानी को हमले को अंजाम देने में एक पाकिस्तानी आतंकवादी की सहायता करने के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी सहपठित धारा 302 के तहत आपराधिक साजिश का दोषी पाया गया, जो हत्या के बराबर है.
उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है और औपचारिक सजा और हिरासत के लिए निचली कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया गया है. यह मामला 12 मई, 2003 को कुपवाड़ा के मुख्य चौक स्थित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा के पास हुए एक फिदायीन (आत्मघाती) हमले से जुड़ा है.
पाकिस्तानी आतंकवादी ने CRPF जवानों पर किया हमला
पाकिस्तानी आतंकवादी, जिसकी पहचान मुजफ्फरगढ़, पंजाब, पाकिस्तान के मोहम्मद इब्राहिम उर्फ खलील-उल्लाह के रूप में हुई, जो जैश-ए-मोहम्मद आतंकवादी संगठन का सदस्य था, ने सुरक्षा बलों पर अंधाधुंध गोलीबारी की.
इसमें 113वीं बटालियन के दो केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवान मारे गए, जिसमें कांस्टेबल बी. प्रसाद (नंबर 931130457) और कांस्टेबल बी. रमैया (नंबर 880909346) शामिल थे. हमले के दौरान हुई गोलीबारी और उसके बाद हुए ग्रेनेड विस्फोट में पुलिस और CRPF के जवानों सहित छह अन्य घायल हो गए थे.
आतंकवादी को घटनास्थल पर ही मार गिराया गया था
राज्य का प्रतिनिधित्व उप महाधिवक्ता, एडवोकेट बिक्रम दीप सिंह ने किया. अभियोजन पक्ष के अनुसार, इब्राहिम को बेल्ट संख्या 1260-केपी वाली पुलिस वर्दी पहने, वानी और उसके सह-आरोपी, थाने के मोहरिर (रिकॉर्ड कीपर) अब्दुल अहद राथर से एक आधिकारिक पुलिस वाहन (टाटा 407) में सोगाम पुलिस स्टेशन से हमले स्थल तक पहुंचाया गया
वाहन में यात्रा करने वाले पुलिस कांस्टेबलों सहित गवाहों ने गवाही दी कि इब्राहिम ने लालपोरा के विशेष अभियान समूह (SOG) के सदस्य के रूप में खुद को पेश किया था. आतंकवादी को घटनास्थल पर ही मार गिराया गया, जब उससे फेंका गया एक ग्रेनेड वापस उछलकर फट गया, जिससे उसका सिर विकृत हो गया.
अपर्याप्त सबूतों के कारण दोनों आरोपियों को राहत
बरामद वस्तुओं में एक एके-47 राइफल, छह मैगजीन, 43 राउंड और चार हथगोले शामिल थे. कुपवाड़ा की सत्र कोर्ट ने 28 जनवरी, 2011 को गवाहों के बयानों में विसंगतियों और साजिश से जुड़े अपर्याप्त सबूतों का हवाला देते हुए वानी और राथर दोनों को बरी कर दिया.
राज्य ने इस फैसले को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि निचली कोर्ट ने प्रमुख गवाहों, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे, जिन्होंने वानी की आतंकवादी के साथ संदिग्ध बातचीत का वर्णन किया था, के विश्वसनीय साक्ष्यों को नजरअंदाज कर दिया.
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को विकृत बताया
अपने 30-पृष्ठ के फैसले में, हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट के दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए उसे "विकृत" और "गलत" बताया, खासकर अभियोजन पक्ष के गवाहों पीडब्ल्यू-32 (कांस्टेबल अयाज अहमद), पीडब्ल्यू-33 (कांस्टेबल रियाज अहमद) और अन्य की गवाही को खारिज करने के लिए.
पीठ ने कहा कि एसएचओ के रूप में वानी को इब्राहिम के आतंकवादी जुड़ाव और उद्देश्यों की पूरी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने हमले के लिए "मौन सहमति" दी, जिससे आतंकवादी को लोगों की जान बचाने के अपने कर्तव्य के बावजूद "तबाही मचाने" का मौका मिल गया.
कोर्ट ने राठर मामले को काल्पनिक बताया
कोर्ट ने मामले की तुलना भीड़ पर भरी हुई तोप चलाने के समान की और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 300 के तहत मौत का कारण बनने के इरादे पर जोर दिया. हालांकि, कोर्ट को राठर के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला, और उनके खिलाफ मामले को "काल्पनिक" और सबूतों से रहित बताया गया.
उनकी बरी होने के फैसले को बरकरार रखा गया, और पीठ ने इस बात पर सहमति जताई कि वर्दी की उपलब्धता (एक अनुपस्थित कांस्टेबल से) की जानकारी मात्र से साजिश की पुष्टि नहीं होती. हमले के दौरान इब्राहिम की मृत्यु के कारण उसके खिलाफ कार्यवाही रोक दी गई थी.
पूर्व मंत्री की हत्या मामले का भी उल्लेख किया गया
वानी, जो बरी होने के बाद भी निवारक हिरासत में रहा और फिर रिहा हुआ, अब आजीवन कारावास की सजा काटेगा. कोर्ट ने निर्देश दिया कि फैसले की एक प्रति अनुपालन के लिए निचली कोर्ट को भेजी जाए.
इस मामले में इलाके में पहले हुई हत्याओं का भी उल्लेख है, जिनमें पूर्व कानून मंत्री मुश्ताक अहमद लोन और उनके भाई की हत्या भी शामिल है, जिसमें आरोपी कथित रूप से शामिल थे. हालांकि, यहां उन पर सीधे आरोप नहीं लगाए गए.