लोकप्रिय लोकगायिका और अब चुनावी चेहरा बनीं मैथिली ठाकुर ने ABP न्यूज़ से खास बातचीत में बताया कि वह चुनाव प्रचार के लिए हमेशा 'मंत्रोच्चारण और पूजा-पाठ करके निकलती हैं. उन्होंने कहा कि वह जहां भी जाती हैं पहले गीत गाती हैं और फिर चुनाव प्रचार करती हैं. यह लोगों का प्यार है जो उन्मुहें मिला है. 

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उन्होंने आगे बताया कि लोग उनसे सिर्फ वोट नहीं, दो लाइन गीत सुनने की उम्मीद भी रखते हैं. लोग चाहते हैं कि वह बात करते हुए दो लाइन सुना दें. यह गीतों का सिलसिला चुनाव के हार-जीत से भी ऊपर है, यही लोगों का प्यार है जो उन्हें मिलता है.

जिन मैथिली पर बिना पैसे लिए गाना न गाने के आरोप लगते हैं, वही अब हर जगह गीत गाकर अपना प्रचार कर रही हैं. कुछ समय पहले एक गांव के लोगों ने उन पर आरोप लगाया था कि वे कार्यक्रम में गाने के लिए 5 लाख रुपये मांग रही थीं. इस पर जब उनके पिता से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा था कि सोशल मीडिया पर चल रही बातों का वे कोई जवाब नहीं देंगे. अब यही मैथिली अपने गीतों के माध्यम से मतदाताओं के बीच खुद को 'जनता की बेटी' के रूप में पेश कर रही हैं.

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चाहती हूं चुनाव की तारीख बढ़ जाए- मैथिली ठाकुर

मैथिली ठाकुर ने अपनी अनूठी शैली का भी ज़िक्र किया. मंच पर गाना और सेलिब्रिटी के तौर पर खड़ा होना दोनों के बीच अलग अनुभव मिलता है. “मैं यूं ही गा गा कर चुनाव प्रचार करती रहूं. अब तो चाहती हूं चुनाव की तारीख बढ़ जाए,” उन्होंने हंसते हुए कहा. उनकी बातों से पता चलता है कि वे गीतों के जरिए जनमानस से जुड़ने को प्राथमिकता देती हैं और इसे सिर्फ प्रदर्शन नहीं बल्कि जनतात्मक लगाव मानती हैं.

विपक्ष पर चोट और चुनावी संकल्प

मैथिली ठाकुर ने स्पष्ट कहा कि वे विपक्ष की कद्र करती हैं, पर मैदान युद्ध जैसा है और वे लड़ाई पूरी शिद्दत से लड़ेंगी. “विपक्ष की कद्र करती हूं लेकिन युद्ध का मैदान है- युद्ध करूंगी.” उनके इस आत्मविश्वास और जनसंपर्क की वजह से राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों में बेचैनी बढ़ी है- लोकगीतों के जरिए वोटरों के दिल पर गहरा असर पड़ने के कारण विपक्ष अपनी नींद खोते दिखता है, ऐसे विश्लेषण स्थानीय राजनीतिक गलियारों में किए जा रहे हैं.

जनसमूहों पर असर और गीतों की शक्ति

मैथिली ने यह भी बताया कि “कब सभा में 50 लोग मेरा गाना सुन 500 बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता.” यह बयान इस बात का संकेत है कि उनका लोकगीत-आधारित प्रचार जनसमूहों पर भावनात्मक असर डाल रहा है और यही वजह है कि राजनीतिक रणनीतिकार इसे गंभीरता से देख रहे हैं.

मैथिली ठाकुर का चुनावी अंदाज़ पारंपरिक रैलियों से अलग है- पूजा-पाठ और मंत्रोच्चारण के बीच गान-ग्रंथ का यह मिश्रण उन्हें मतदाताओं के और करीब ला रहा है. गीतों का यह सिलसिला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक पुल बनकर उभर रहा है, जो चुनावी जीत-हार से कहीं आगे जाकर लोगों के दिलों में जगह बना रहा है.