Kabirdas Jayanti 2022: सफलता के करीब पहुंचा देते हैं कबीर के ये दोहे
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान (अर्थ- सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए. तलवार की कीमत होती है मयान की नहीं)
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय (अर्थ - दूसरों में बुराई मत ढूंढो, खुद की खामियों पर काम करों)
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय, सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय (अर्थ- ज्ञानी वही है जो बात के महत्व को समझे, बेकार की बातों में न उलझे)
तिनका कबहुं ना निन्दिये, जो पांवन तर होय, कबहुं उड़ी आंखि न पड़े, तो पीर घनेरी होय (अर्थ - छोटे बड़े के फेर में कभी नहीं पड़ना चाहिए, इंसानों को समान नजरों से देखें)
चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह, जिसको कुछ नहीं चाहिए वो शहनशाह (अर्थ - संतुष्ट व्यक्ति सदा सुखी होता है)
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय (अर्थ- धैर्य से पुण्य फल मिलता है, पेड़ को सौ घड़े पानी से भी सींच दें, तब भी ये फल ऋतु आने पर ही देगा)
संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत (अर्थ- कई दुश्मनों से घिरे होने पर भी सज्ज्न अपना स्वभाव नहीं बदलता,जैसे चंदन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं पर वो अपनी शीतलता नहीं छोड़ता)
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि (अर्थ- वाणी अमूल्य रत्न है. हमेशा तोल-मोल कर बोलना चाहिए)
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय (अर्थ- हमारी निंदा करने वाले से घृणा नहीं प्रेम करें. क्योंकि वो आपकी कमियां बताकर आपको सचेत करता है)