Mahabharat: जब दुर्योधन ने भीम को विष देकर गंगा में फेंका, फिर हुआ चमत्कार!

महाभारत कथा
हस्तिनापुर में पांडव और कौरव एक साथ शिक्षा प्राप्त करते और खेलकूद में भाग लेते थे. सभी राजकुमारों में भीम सबसे अधिक बलवान थे. उनकी शक्ति और साहस देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे. यही असाधारण बल धीरे-धीरे दुर्योधन के मन में ईर्ष्या और द्वेष का कारण बनने लगा.
भीम खेल-खेल में कौरवों को उठा लेते, पेड़ों को हिलाकर उन्हें नीचे गिरा देते और जलक्रीड़ा में भी सभी पर भारी पड़ते थे. दुर्योधन को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं था. उसे लगता था कि भीम की बढ़ती शक्ति भविष्य में उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है.
दुर्योधन ने मन ही मन भीम को रास्ते से हटाने का निश्चय कर लिया. उसने एक ऐसी योजना बनाई जिसमें किसी को उस पर संदेह भी न हो. उसने गंगा तट पर बने सुंदर प्रमाणकोटि उद्यान में जल-विहार और मनोरंजन का आयोजन करने का प्रस्ताव रखा.
दुर्योधन के निमंत्रण पर सभी पांडव और कौरव प्रमाणकोटि पहुँचे. वहाँ सुंदर भवन, मनोरंजन के साधन और स्वादिष्ट भोजन की व्यवस्था की गई थी. सभी राजकुमार खेलकूद और जल-विहार में मग्न हो गए, जबकि दुर्योधन अपनी गुप्त योजना को सफल बनाने का अवसर खोज रहा था.
जब सभी राजकुमार भोजन कर रहे थे, तब दुर्योधन ने अवसर देखकर भीम के भोजन में घातक विष मिला दिया. भीम को इस विश्वासघात का कोई आभास नहीं था. उन्होंने सामान्य रूप से भोजन किया और कुछ समय बाद विष का प्रभाव उनके शरीर पर दिखाई देने लगा.
विष के प्रभाव से भीम अचेत होकर गहरी नींद में चले गए. रात के समय दुर्योधन ने उन्हें बेलों से बांध दिया और गुप्त रूप से गंगा की तेज धारा में फेंक दिया. उसे विश्वास था कि अब भीम कभी वापस नहीं लौटेंगे और उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी समाप्त हो जाएगा.
गंगा की धारा में बहते हुए भीम नागों के क्षेत्र में पहुँच गए. वहाँ अनेक सर्पों ने उन्हें डस लिया. आश्चर्य की बात यह थी कि सर्पों के विष ने उनके शरीर में पहले से मौजूद विष का प्रभाव समाप्त कर दिया. कुछ समय बाद भीम को चेतना वापस आने लगी.
होश में आने पर भीम की भेंट नागराज वासुकि और अन्य नागों से हुई. नागों ने उन्हें पहचान लिया और सम्मानपूर्वक अपने लोक में ले गए. वहाँ भीम का आदर-सत्कार किया गया और उन्हें विशेष दिव्य पेय प्रदान किया गया जिससे उनकी शक्ति बढ़ने वाली थी.
नागलोक में भीम को दिव्य अमृत तुल्य रस पिलाया गया. उस अद्भुत पेय को ग्रहण करने के बाद उनके शरीर में दस हजार हाथियों के बराबर बल आ गया. भीम पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली बन गए और उनका आत्मविश्वास भी कई गुना बढ़ गया.
कुछ समय बाद भीम हस्तिनापुर लौटे और माता कुंती तथा अपने भाइयों से मिले. सभी उन्हें जीवित देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए. भीम ने पूरी घटना सुनाई, लेकिन युधिष्ठिर ने सावधानी बरतने की सलाह दी. इस घटना ने पांडवों और कौरवों के बीच बढ़ती शत्रुता को और स्पष्ट कर दिया.