Mahishasura Mardini: जब देवी दुर्गा ने अपने दिव्य स्वरूप से महिषासुर का विनाश कर देवताओं को दिलाई विजय

देवी दुर्गा की कथा
दानवराज रंभासुर का एक महिषी (भैंस) से संबंध हुआ, जिसके परिणामस्वरूप महिषासुर का जन्म हुआ. इसी कारण उसका नाम महिषासुर पड़ा. जन्म से ही वह असाधारण शक्ति और पराक्रम का स्वामी था. उसे यह वरदान भी प्राप्त था कि वह अपनी इच्छा के अनुसार मानव और भैंस, दोनों रूप धारण कर सकता था.
अत्यधिक शक्ति प्राप्त करने की इच्छा से महिषासुर ने ब्रह्माजी की कठोर तपस्या आरंभ की. वर्षों तक तप करने के बाद उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी उसके सामने प्रकट हुए. महिषासुर ने अमरता का वर मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने उसे समझाया कि जन्म लेने वाले प्रत्येक प्राणी की मृत्यु निश्चित होती है.
अमरता न मिलने पर महिषासुर ने चतुराई से दूसरा वरदान मांगा. उसने कहा कि उसकी मृत्यु किसी देवता, दानव या पुरुष के हाथों न हो. ब्रह्माजी ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली. महिषासुर को विश्वास था कि कोई स्त्री उसे कभी पराजित नहीं कर सकेगी, इसलिए वह स्वयं को अजेय समझने लगा.
वरदान प्राप्त करने के बाद महिषासुर का अहंकार बढ़ गया. उसने विशाल सेना तैयार कर देवताओं पर आक्रमण कर दिया. लंबे युद्ध के बाद इंद्र सहित अनेक देवता पराजित हो गए. स्वर्गलोक पर उसका अधिकार हो गया और धीरे-धीरे उसने तीनों लोकों में अपना प्रभाव स्थापित कर लिया.
महिषासुर के अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवता भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास पहुंचे. उन्होंने अपनी समस्या बताई और समाधान मांगा. तब सभी देवताओं ने मिलकर आदिशक्ति की आराधना की. उनकी प्रार्थना और दिव्य तेज से एक महान शक्ति का प्राकट्य हुआ, जिन्हें देवी दुर्गा कहा गया.
देवताओं के तेज से प्रकट हुई देवी दुर्गा अद्भुत और तेजस्वी थीं. उनके स्वरूप में अपार शक्ति और साहस झलक रहा था. उनका जन्म केवल महिषासुर के अत्याचारों का अंत करने के लिए हुआ था. देवी के प्रकट होते ही देवताओं में नई आशा और उत्साह का संचार हो गया.
महिषासुर से युद्ध के लिए सभी देवताओं ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र देवी को अर्पित किए. भगवान शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने सुदर्शन चक्र और इंद्र ने वज्र प्रदान किया. अन्य देवताओं ने भी अनेक शक्तियां और हथियार दिए. सिंह को देवी का वाहन बनाया गया, जिससे उनका स्वरूप और भी प्रभावशाली हो उठा.
देवी दुर्गा सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि में पहुंचीं. महिषासुर के सेनापति और असंख्य असुर सेना ने उनका मार्ग रोकने का प्रयास किया. भयंकर युद्ध आरंभ हुआ, जिसमें देवी ने अपने दिव्य अस्त्रों से अनेक राक्षसों का संहार किया. युद्धभूमि में देवी की शक्ति देखकर असुर सेना भयभीत होने लगी.
अपनी सेना को पराजित होते देख महिषासुर स्वयं युद्ध के लिए आगे आया. उसने कभी भैंस तो कभी मानव रूप धारण कर देवी को भ्रमित करने का प्रयास किया. दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ. देवी दुर्गा ने अद्भुत साहस और युद्ध कौशल का परिचय देते हुए महिषासुर के हर आक्रमण का डटकर सामना किया.
अंत में देवी दुर्गा ने अपने त्रिशूल और अन्य दिव्य अस्त्रों की सहायता से महिषासुर का वध कर दिया. उसके मरते ही तीनों लोकों में शांति स्थापित हो गई. देवताओं ने देवी की विजय का उत्सव मनाया और पुष्पवर्षा की. इसी महान विजय की स्मृति में मां दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी के नाम से पूजा जाता है.