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बिना नट बोल्ट के तैयार हुआ देश का यह ब्रिज, जानिए कितने टन लोहे से बना यह अजूबा

निधि पाल   |  03 Jan 2026 10:33 AM (IST)
बिना नट बोल्ट के तैयार हुआ देश का यह ब्रिज, जानिए कितने टन लोहे से बना यह अजूबा

भारत में एक ऐसा पुल है, जिसे रोज लाखों लोग पार करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इसकी असली कहानी जानते हैं. न इसमें नट हैं, न बोल्ट, फिर भी यह दशकों से मजबूती से खड़ा है. इस पुल ने जंग की बमबारी देखी, आजादी की लड़ाई झेली और भयानक अकाल का दौर भी देखा. हैरानी की बात यह है कि इतना ऐतिहासिक होने के बावजूद इसका कभी औपचारिक उद्घाटन तक नहीं हुआ. आइए इसके बारे में जानें.

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कोलकाता का हावड़ा ब्रिज भारत ही नहीं, दुनिया के सबसे मशहूर पुलों में गिना जाता है. अंग्रेजी शासन के दौरान शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट 1936 में निर्माण के चरण में आया और 3 फरवरी 1943 को आम जनता के लिए खोल दिया गया.

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हालांकि, आज तक इसका कोई औपचारिक उद्घाटन नहीं हुआ. इसके बावजूद यह पुल 80 साल से ज्यादा समय से कोलकाता की जीवनरेखा बना हुआ है. हावड़ा ब्रिज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके निर्माण में कहीं भी नट-बोल्ट का इस्तेमाल नहीं हुआ है.

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पूरी संरचना को जोड़ने के लिए धातु की कीलों यानी रिवेट्स का सहारा लिया गया. यही वजह है कि इसे इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना माना जाता है. रिवेट तकनीक ने इस पुल को ज्यादा लचीलापन और मजबूती दी, जो भारी ट्रैफिक के बावजूद आज भी कायम है.

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यह पुल हुगली नदी के दोनों किनारों पर बने सिर्फ दो विशाल पायों पर टिका है. इन पायों की ऊंचाई करीब 280 फीट है, जबकि इनके बीच की दूरी लगभग 1500 फीट है. अपने समय में हावड़ा ब्रिज दुनिया का तीसरा सबसे लंबा कैंटिलीवर ब्रिज था. खास बात यह है कि नदी के बीच में कोई खंभा नहीं है, जिससे जल यातायात में कभी रुकावट नहीं आई.

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हावड़ा ब्रिज के निर्माण में कुल 26,500 टन स्टील का इस्तेमाल हुआ था. इसमें से करीब 23,500 टन स्टील टाटा स्टील ने सप्लाई किया था. उस दौर में यह भारत की औद्योगिक क्षमता का बड़ा उदाहरण था. पुल का निर्माण ब्रेथवेट, बर्न एंड जोसेप कंस्ट्रक्शन कंपनी ने किया था, जिसने उस समय की सबसे आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया.

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दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान की बमबारी का खतरा कोलकाता तक पहुंच चुका था. एक जापानी बम हावड़ा ब्रिज के काफी करीब गिरा, लेकिन पुल को कोई नुकसान नहीं हुआ.

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इसके अलावा यह पुल भारत की आजादी की लड़ाई और 1943 के बंगाल अकाल का भी मूक गवाह रहा है, जब लाखों लोग इसी रास्ते से मदद और राहत के लिए गुजरे.

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