कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP. यह नाम एक मजाक था और CJI सूर्यकांत के 'तिलचट्टे' वाले बयान का जवाब.अब यह मजाक भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा सवाल बन गया है. जिसे कभी 'तिलचट्टे' कहकर नकारा गया, वही आज 'कॉकरोच' बनकर इतना फैल गया कि उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. अब हर किसी के मन में एक ही सवाल है कि अगर यह CJP असली राजनीतिक पार्टी बन गई, तो किसका बेस खा जाएगी और ऐसा होने की कितनी संभावना है...

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अगर CJP राजनीति में आई तो किसका वोट काटेगी?

CJP के राजनीति में आने के बाद 3 बड़े टारगेट हो सकते हैं...

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1. आम आदमी पार्टी (AAP): 'सेम एंटी-एस्टैब्लिशमेंट, न्यू जनरेशन'

CJP की तुलना सबसे पहले AAP से हो रही है. यह तुलना बेमानी नहीं है. AAP का जन्म 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ था. उसका नारा था, 'सिस्टम बदलो'. CJP का जन्म 2026 में NEET पेपर लीक और CJI के 'तिलचट्टे' वाले बयान से हुआ. इसका भी नारा है, 'सिस्टम बदलो.'

AAP ने पिछले एक दशक में जो किया, वो CJP ने कुछ हफ्तों में कर दिखाया. इंस्टाग्राम पर 25.9 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स हासिल कर लिए. यह संख्या बीजेपी के आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट से भी ज्यादा है. एक इलेक्शन स्ट्रैटेजिस्ट ने तो X पर पोस्ट कर दिया, 'AAP ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को खत्म किया. अब देखते हैं CJP AAP को कहां खत्म करती है.'

CJP का 'एंटी-एस्टैब्लिशमेंट' वाला एंगल, उसका युवा चेहरा और डिजिटल नेटवर्क AAP के कोर वोटर को लुभाने के लिए काफी है. AAP का बेस शहरी मध्यम वर्ग और युवा है और यही CJP का सबसे मजबूत बेस है. अगर CJP चुनावी मैदान में उतरी, तो सबसे पहला नुकसान AAP को ही होगा.

2. कांग्रेस: 'जो आवाज नहीं बन पाई, वही आवाज खा जाएगी'

दूसरा निशाना कांग्रेस है और यहां दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के अंदर ही दो राय हैं.

एक तरफ कांग्रेस CJP के मुद्दों के खुलेतौर पर सपोर्ट कर रही है. राहुल गांधी ने तीन मांगें रखी हैं और CJP के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. दूसरी तरफ, कांग्रेस को अंदर ही अंदर यह डर भी सता रहा होगा कि कहीं CJP उनका ही वोट न काट ले. CJP की लोकप्रियता दिखाती है कि युवाओं के मन में कितनी छटपटाहट है. इसका मतलब यह भी है कि लोगों को विपक्ष में कोई उम्मीद नहीं दिखती.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि CJP की ताकत कांग्रेस की कमजोरी है. कांग्रेस के पास वो युवा चेहरा, वो डिजिटल कनेक्ट और वो 'बदलाव' वाला नारा नहीं है जो CJP के पास है. अगर CJP चुनाव लड़ी, तो कांग्रेस का 'युवा और शहरी' वोटर सीधे CJP के पास जा सकता है.

3. बीजेपी: 'अगर विपक्ष कमजोर हुआ तो BJP को फायदा, लेकिन...'

यहां एक उल्टा गणित है. अगर CJP ने कांग्रेस को खा लिया और AAP का भी वोट काट लिया, तो वोटों का बंटवारा होगा. इससे बीजेपी को सीधा फायदा पहुंचेगा. लेकिन CJP सिर्फ विपक्ष का वोट नहीं काटेगी. CJP का नारा 'सिस्टम बदलो' है, यानी सीधे सरकार पर निशाना है. CJP NEET पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लड़ रही है. ये वही मुद्दे हैं जिन पर बीजेपी की छवि खराब हो रही है.

तो असल में CJP का सबसे बड़ा निशाना बीजेपी भी बन सकती है. अगर CJP विपक्ष का वोट काटकर बीजेपीको फायदा पहुंचाती है, तो यह CJP के लिए आत्मघाती होगा. इस वजह से CJP को अपनी रणनीति बहुत सोच-समझकर बनानी होगी. लेकिन क्या CJP के राजनीतिक पार्टी बनने की कोई संभावना है?

CJP के राजनीतिक पार्टी बनने के 3 बड़े तर्क हैं:

  • इतिहास गवाह है आंदोलन पार्टी बनते: 1974 के जयप्रकाश नारायण आंदोलन ने 1977 में जनता पार्टी को जन्म दिया, जिसने कांग्रेस को हराया. 2011 के अन्ना आंदोलन ने AAP को जन्म दिया. दोनों ही आंदोलन सत्ता विरोधी थे, दोनों ने नई पार्टियों को जन्म दिया. CJP भी एक सत्ता विरोधी आंदोलन है. आंदोलन से पार्टी बनने का फॉर्मूला भारत में पहले भी काम कर चुका है और CJP के साथ भी हो सकता है.
  • डिजिटल ताकत की चमक: CJP ने 29.6 मिलियन इंस्टाग्राम फॉलोअर्स बटोर लिए हैं. यह संख्या किसी भी भारतीय राजनीतिक दल से कम नहीं है. सोशल मीडिया पर इसका दबदबा है. इतनी बड़ी डिजिटल मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.
  • कानूनी रास्ता खुला: भारत में कोई भी नागरिक समूह चुनाव आयोग में आवेदन करके राजनीतिक पार्टी रजिस्टर कर सकता है. हरियाणा के एक वकील ने पहले ही CJP को रजिस्टर्ड करने की मांग कर दी है. कानूनी तौर पर CJP के पार्टी बनने में कोई रोड़ा नहीं है.

CJP के राजनीतिक पार्टी न बनने के 3 बड़े तर्क हैं:

  • चुनाव न लड़ने का इरादा: CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 16 जून 2026 को नागपुर में प्रदर्शन के बाद साफ कह दिया कि CJP चुनाव नहीं लड़ेगी. अभी तक CJP का कोई भी आधिकारिक बयान इससे अलग नहीं आया है. जब तक CJP का नेतृत्व अपना फैसला नहीं बदलता, पार्टी बनने की संभावना कम है.
  • संगठनात्मक ढांचा न के बराबर: राजनीतिक पार्टी बनने के लिए सिर्फ सोशल मीडिया फॉलोअर्स काफी नहीं होते. चाहे बीजेपी हो, कांग्रेस हो या AAP, सभी के पास बूथ-लेवल वर्कर्स, स्पष्ट पार्टी संरचना, फंडिंग, उम्मीदवारों का चयन मानदंड और जमीनी संगठन होता है. CJP के पास अभी इनमें से कुछ भी नहीं है. सोशल मीडिया की ताकत को जमीनी ताकत में बदलना आसान नहीं है.
  • अधूरी नीतियां: CJP का एजेंडा अभी सिर्फ NEET पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक सीमित है. राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, रोजगार, किसान और क्षेत्रीय मुद्दों पर स्पष्ट नीतियां चाहिए. CJP के पास अभी यह नहीं है.

'AAP-लाइट' बनकर रह जाने का खतरा

CJP को 'AAP-लाइट' कहा जा रहा है. AAP ने 2011 के अन्ना आंदोलन से जन्म लिया, लेकिन उसे राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल करने में सालों लग गए. CJP के सामने भी यही चुनौती है कि क्या यह सिर्फ एक डिजिटल घटना बनकर रह जाएगी या असली राजनीतिक ताकत बनेगी?