पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के मतदान चल रहे हैं. इसके साथ ही 2026 के 5 राज्यों (पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू, असम, केरलम और पुडुचेरी) के चुनाव खत्म हो जाएंगे. फिर सबकी निगाहें टिक जाएंगी एग्जिट पोल पर. एग्जिट पोल यानी चुनावी नतीजों का अंदाजा. इससे लोगों की तसल्ली और बैचेनी में इजाफा हो जाता है, कि कौन सी पार्टी जीतने वाली है. यह वोटिंग के बाद होने वाला सर्वे है, जो कभी चुनावी नतीजों जैसा होता है, तो कभी बिल्कुल उलट. जानेंगे एक्सप्लेनर में...
सवाल 1: एग्जिट पोल क्या होते हैं?जवाब: जैसा कि नाम से जाहिर है. एग्जिट पोल यानी पोलिंग बूथ से निकलने वाले वोटर्स से बातचीत के आधार पर तैयार पोल. ये एक तरह का चुनावी सर्वे होता है. मतदान वाले दिन जब मतदाता वोट देकर पोलिंग बूथ से बाहर निकलता है तो उससे वोटिंग को लेकर सवाल पूछे जाते हैं. इसमें उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने किसको वोट दिया है?
हजारों मतदाताओं के जवाब जुटाने के बाद एजेंसियां उसका एनालिसिस करती हैं, जिससे अंदाजा लग जाता है कि हवा किसकी तरफ है. गणना से ये भी बताया जाता है कि किसको कितनी सीटें मिल सकती हैं. साथ ही उन मुद्दों, नेताओं और घोषणाओं के बारे में भी पता चलता है, जिन्होंने मतदाताओं को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है.
सवाल 2: एग्जिट पोल की शुरुआत कब और कैसे हुई?जवाब: चुनावी सर्वे की शुरुआत सबसे पहले अमेरिका में हुई. जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने अमेरिकी सरकार के कामकाज पर लोगों की राय जानने के लिए ये सर्वे किया था. उसके बाद ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और डेनमार्क में भी चुनाव से पहले सर्वे हुए. ये 1930 और 1940 का दशक था. एग्जिट पोल की शुरुआत काफी बाद में हुई. टाइम मैगजीन के मुताबिक, 1967 में पहली बार दुनिया में बड़े स्तर पर कोई एग्जिट पोल किया गया था:
- अमेरिका के पॉलिटिकल रिसर्चर वॉरेन मिटोफस्की ने केंटुकी राज्य में होने वाले गवर्नर चुनाव के दौरान पहली बार एग्जिट पोल किया था.
- डच समाजशास्त्री मार्सेल वैन डैम ने इसी साल 15 फरवरी को नीदरलैंड्स के आम चुनाव के दौरान उम्मीदवारों को लेकर एक सर्वे किया था.
दोनों ही जगहों पर एक्सपर्ट ये जानने की कोशिश कर रहे थे कि लोग आखिर किसे और क्यों वोट कर रहे हैं? इसके बाद वॉरेन और मार्सेल का ये तरीका मीडिया कंपनियां इस्तेमाल करने लगीं.
दुनिया में पहली बार किस मीडिया कंपनी ने ये तरीका अपनाया, इसकी सटीक जानकारी नहीं है. हालांकि, मीडिया कंपनियों की वजह से 1970 के दशक में अमेरिका और पश्चिमी देशों में तेजी से एग्जिट पोल का कल्चर बढ़ने लगा. मतदान से नतीजों के बीच लोगों की उत्सुकता को कैटर करने के लिए मीडिया एग्जिट पोल का सहारा लेता था.
सवाल 3: एग्जिट पोल चुनाव खत्म होने के बाद ही क्यों जारी होते हैं?जवाब: 1980 में एग्जिट पोल पहली बार विवादों में आए. इस साल अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहे थे. मीडिया कंपनी NBC ने मतदान खत्म होने से 3 घंटे पहले ही एग्जिट पोल जारी कर दिए. इस पोल में बताया गया कि जिमी कार्टर को हराकर रोनाल्ड रीगन चुनाव जीत रहे हैं. इसको लेकर जिमी के समर्थकों ने जोरदार विरोध किया.
बाद में ये मामला अमेरिकी संसद में उठा. इस सर्वे ने मतदाताओं को कितना प्रभावित किया है, ये पता लगाने के लिए जांच कराई गई. इसके बाद मतदान खत्म होने से पहले एग्जिट पोल जारी होने पर अमेरिका में पाबंदी लगा दी गई. बाद में यही लर्निंग दुनिया के दूसरे देशों ने भी अपनाई.
सवाल 4: भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत कब हुई?जवाब: भारत में एग्जिट पोल की शुरुआत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन (IIPU) के तत्कालीन प्रमुख एरिक डी कोस्टा ने की थी. 1980 के दशक में भारत में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर एग्जिट पोल को लेकर पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रणय रॉय और यूके के पॉलिटिकल एक्सपर्ट डेविट बटलर ने मिलकर काम किया. उनके रिसर्च को अशोक लाहिड़ी ने अपनी किताब 'द कम्पेंडियम ऑफ इंडियन इलेक्शन' में पब्लिश किया है.
1996 में सरकारी चैनल दूरदर्शन ने CSDS के साथ मिलकर पहली बार एग्जिट पोल जारी किए. इसमें बीजेपी को 190-200 सीटें दिखाईं और कांग्रेस को 140-150 सीटें दीं. चुनावी नतीजे इस अंदाजे के आसपास रहे. बीजेपी को 161 सीटें मिलीं और सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस को 140 सीटें मिली थीं. इसके बाद सभी सैटेलाइट चैनलों ने एग्जिट पोल जारी करना शुरू कर दिया. कुछ समय बाद एग्जिट पोल मतदान के बाद होने वाला सबसे लोकप्रिय टीवी शो बन गया.
सवाल 5: भारत में कौन-सी एजेंसियां एग्जिट पोल करवाती हैं और कौन से फैक्टर तय होते हैं?जवाब: देश में कोई भी सरकारी संस्था एग्जिट पोल नहीं करवाती है. करीब 15 प्राइवेट एजेंसियां अलग-अलग मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर एग्जिट पोल जारी करती हैं. इनमें चाणक्य, सी वोटर, माय एक्सिस, जन की बात, नील्सन आदि हैं.
एग्जिट पोल कितना एक्यूरेट है, ये 3 मुख्य फैक्टर पर निर्भर करता है:
- सैंपल साइज: जिस एग्जिट पोल का सैंपल साइज जितना बड़ा होता है, उसे उतना ही ज्यादा एक्यूरेट माना जाता है. मतलब ये हुआ कि सर्वे में जितना ज्यादा से ज्यादा लोगों से संपर्क किया जाए, उतना ज्यादा अच्छा है.
- सर्वे में पूछे जाने वाले सवाल: सैंपल सर्वे में पूछा गए सवाल जितना न्यूट्रल होगा, एग्जिट पोल का रिजल्ट भी उतना ही सटीक होगा.
- सर्वे की रेंज: सर्वे का दायरा जितना बड़ा होगा, रिजल्ट एक्यूरेट होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी. मान लीजिए किसी विधानसभा में सिर्फ दो या तीन पोलिंग बूथ से सैंपल लिए जाते हैं, जहां किसी एक पार्टी के उम्मीदवार की पकड़ है. इससे एग्जिट पोल के रिजल्ट पर असर पड़ सकता है.
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज यानी CSDS के प्रोफेसर संजय कुमार के मुताबिक बिना किसी दल की ओर झुकाव वाले चुनिंदा सवालों के जरिए ही एग्जिट पोल का सही रिजल्ट पता हो सकता है. सर्वे में पूछे गए सवाल, शब्द और समय भी इसके परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं.
सवाल 6: एग्जिट पोल में कैसे सवाल पूछे जाते हैं?जवाब: एग्जिट पोल में डायरेक्ट और इन-डायरेक्ट दोनों तरह के सवाल पूछे जाते हैं. अगर सीधे जवाब नहीं मिलते हैं, तो बात को घुमाकर पूछा जाता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस सर्वे में वोट देकर निकलने वाले वोटर्स से ये 5 सवाल पूछे जाने का अनुमान है:
- आपने किसे वोट दिया और क्यों?
- विधानसभा या लोकसभा सीट का जाति कार्ड कितना सफल है और क्यों?
- क्या किसी पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले से गठबंधन को नुकसान हुआ?
- क्या नौकरी बड़ा इश्यू था और बेरोजगारों ने इस आधार पर वोट किया है?
- क्या लोग धर्म के आधार पर वोट कर रहे हैं?
सवाल 7: भारत में एग्जिट पोल को लेकर क्या कानून और नियम हैं?जवाब: एग्जिट पोल का मामला अलग-अलग वजहों से तीन बार सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है. रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट- 1951 के सेक्शन 126A के मुताबिक मतदान खत्म होने के आधे घंटे बाद ही एग्जिट पोल जारी किया जा सकता है. अगर कोई कंपनी या व्यक्ति मतदान खत्म होने से पहले एग्जिट पोल जारी करता है तो उसे संज्ञेय अपराध माना जाएगा. ऐसा करने वाले को दो साल तक की जेल और जुर्माना या दोनों हो सकता है.
1998 में पहली बार चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत न्यूज पेपर और टीवी चैनलों में एग्जिट पोल पब्लिश किए जाने पर रोक लगाई. इस साल 16 फरवरी से 7 मार्च के बीच लोकसभा चुनाव हो रहे थे. ऐसे में 7 मार्च को शाम 5 बजे तक किसी भी तरह के ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल को पब्लिश किए जाने पर रोक लगा दी गई.
साथ ही तय समय के बाद एग्जिट पोल जारी करने वाली मीडिया कंपनियों को निर्देश दिया गया कि सर्वे में शामिल मतदाताओं के सैंपल साइज, उनकी मैथेडोलॉजी बताना जरूरी है. संस्थाओं को ये भी बताना होगा कि सर्वे के रिजल्ट में क्या खामी और कमियां संभव है.
