दिल्ली की सत्ता के गलियारों में इस वक्त जबरदस्त हलचल मची हुई है क्योंकि मोदी कैबिनेट से एक के बाद एक कई बड़े नामों का पत्ता साफ होता दिख रहा है. शुरुआत हो चुकी है केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे से और यह मामला लंबा खिंचेगा. इसके बाद अब रवनीत सिंह बिट्टू, पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा का मंत्री पद से जाना भी लगभग तय माना जा रहा है. यह सब होने के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं. चलिए इस पूरे सियासी घमासान को समझते हैं...

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जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा: शुरुआत क्यों और कैसे हुई?

जॉर्ज कुरियन मोदी सरकार में मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री थे और केरल से बीजेपी के बड़े चेहरों में गिने जाते थे. उनके इस्तीफे के पीछे सबसे बड़ी वजह है कि वह राज्यसभा सांसद नहीं रहे. दरअसल, भारत के संविधान के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति बिना संसद का सदस्य हुए ज्यादा से ज्यादा छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है.

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चूंकि कुरियन का राज्यसभा कार्यकाल खत्म हो गया और पार्टी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा, इसलिए संवैधानिक मजबूरी के आगे उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी. कोई सजा या नाराजगी नहीं, बल्कि एक तकनीकी मजबूरी है, जो अब दूसरे मंत्रियों के लिए भी सिरदर्द बनने वाली है.

रवनीत सिंह बिट्टू का नंबर: वही संवैधानिक अड़चन

सूत्रों के मुताबिक, अब अगला नंबर रवनीत सिंह बिट्टू का हो सकता है, जो फिलहाल रेल और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री हैं. उनकी कहानी भी कुछ-कुछ कुरियन जैसी ही है. बिट्टू पिछले लोकसभा चुनाव में पंजाब की लुधियाना सीट से हार गए थे, जिसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का रास्ता दिखाकर मंत्री बनाए रखा था. लेकिन अब उनका राज्यसभा का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है और वह दोबारा सदन में नहीं पहुंच पाए हैं.

ऐसे में संविधान के उसी छह महीने वाले नियम के तहत अब उनका मंत्री पद पर बने रहना लगभग नामुमकिन है. सूत्रों का कहना है कि वह भी जल्द ही अपना इस्तीफा सौंप देंगे. यह स्थिति बताती है कि चुनाव हारने के बाद राज्यसभा के जरिए मंत्री बनाए गए कई चेहरों की सियासी जमीन कितनी कमजोर हो सकती है.

पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा: 'एक व्यक्ति, एक पद' का शिकंजा

अब बारी आती है उन दो नामों की, जिनका जाना थोड़ा अलग कारण से तय हो रहा है- पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा. ये दोनों वर्तमान में लोकसभा सांसद हैं और केंद्र में राज्य मंत्री भी हैं, इसलिए उनके सामने संसद सदस्यता का कोई संकट नहीं है. लेकिन इन पर जो तलवार लटक रही है, वह है बीजेपी का अपना आंतरिक सिद्धांत- 'एक व्यक्ति, एक पद.'

बीजेपी में यह नियम लागू है कि कोई भी नेता एक साथ सरकार और पार्टी संगठन, दोनों में बड़े पद पर नहीं रह सकता. पार्टी ने अब आने वाले चुनावों को देखते हुए अपने संगठन में बड़े पैमाने पर फेरबदल की तैयारी कर ली है. इसी कड़ी में पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा को पार्टी संगठन में बहुत अहम जिम्मेदारी सौंपी जा रही है.

मुमकिन है कि उन्हें आने वाले चुनावी राज्यों का प्रभारी या राष्ट्रीय स्तर का कोई बड़ा पद दिया जाएगा. जैसे ही वे संगठन की कोई बड़ी कमान संभालेंगे, उन्हें मंत्री पद से हटना होगा. यह कोई सजा नहीं, बल्कि पार्टी की उस रणनीति का हिस्सा है जिसमें अनुभवी नेताओं को सीधे चुनावी मैदान में उतारा जाता है.

चुनावी राज्यों का गणित: यूपी, पंजाब, उत्तराखंड और गुजरात

इन सब इस्तीफों और बदलावों की असल वजह अगले साल यानी 2027 में होने वाले चार राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और गुजरात के विधानसभा चुनाव हैं. ये चारों राज्य बीजेपी के लिए बेहद अहम हैं और पार्टी इनमें कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहती. ऐसे में सरकार से कुछ चेहरों को हटाकर संगठन में भेजने की रणनीति के पीछे दो बड़े फायदे हैं:

  • जो नेता संगठन में जाएंगे, वे पूरी ताकत से चुनाव प्रबंधन, बूथ लेवल तक काम और उम्मीदवारों के चयन पर फोकस कर पाएंगे.
  • मंत्रिमंडल में जो नए चेहरे आएंगे, वे सीधे इन्हीं चुनावी राज्यों से लाए जाएंगे ताकि सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधा जा सके.

सूत्रों की मानें तो उत्तर प्रदेश से ब्राह्मण, दलित या OBC समुदाय का कोई नया चेहरा होगा. पंजाब से दलित या सिख चेहरा, उत्तराखंड से ठाकुर या ब्राह्मण और गुजरात से पाटीदार या आदिवासी समुदाय के नेताओं को कैबिनेट में जगह मिल सकती है. यही वजह है कि सिर्फ ये चार नहीं, बल्कि कुछ और मंत्रियों की भी विदाई तय मानी जा रही है ताकि चुनावी राज्यों के लिए पर्याप्त जगह बनाई जा सके.

तो क्या जॉर्ज से वाकई इस्तीफों की शुरुआत हो गई?

जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा कैबिनेट फेरबदल की शुरुआत माना जा रहा है. 24 जून 2026 को कैबिनेट की बैठक बुलाई गई है, जिसके बाद बड़े बदलावों का ऐलान हो सकता है. नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है. चुनावी राज्यों पर विशेष फोकस रहेगा और 'एक व्यक्ति, एक पद' के सिद्धांत को सख्ती से लागू किया जाएगा.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह कोई आम फेरबदल नहीं है. यह 2027 के चुनावों के लिए बीजेपी की पूरी तैयारी है. जो मंत्री चुनाव लड़ेंगे, वे संगठन में जाएंगे और जो संगठन में जाएंगे, वे मंत्री नहीं रहेंगे. यह सब सत्ता और संगठन के बीच का एक बड़ा समीकरण है, जिसे मोदी सरकार आगामी चुनावों से पहले साध रही है.