दुनिया भर के देशों के पास मौजूद महाविनाशक परमाणु हथियारों की असल गिनती हमेशा से एक बड़ा रहस्य रही है. कोई भी देश अपनी इस रणनीतिक ताकत को पूरी तरह गोपनीय रखता है. लेकिन स्वीडन की मशहूर संस्था 'स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट' ‘सिपरी’ अपनी ताजा रिपोर्ट में हर साल इन हथियारों का पूरा लेखा-जोखा सामने ला देती है. सिपरी की ताजा रिपोर्ट 2026 के मुताबिक, भारत ने पहली बार अपने 12 परमाणु हथियार मोर्चे पर तैनात कर दिए हैं, जबकि पिछले साल 2025 में एक भी हथियार तैनात नहीं था. इसके साथ ही भारत का कुल परमाणु भंडार भी 180 से बढ़कर 190 हो गया है.
SIPRI को कैसे मिलता है गोपनीय डेटा?
परमाणु हथियारों से जुड़ी इस रिपोर्ट को पढ़ते समय एक बात साफ तौर पर समझनी होगी. रूस और अमेरिका जैसे महाशक्ति देशों की तरह ही भारत भी अपने परमाणु हथियारों की सटीक संख्या, उनकी वास्तविक क्षमता और उनके नाम आधिकारिक रूप से कभी भी सार्वजनिक नहीं करता है. यह देश की सुरक्षा से जुड़ा बेहद संवेदनशील मामला होता है. यही वजह है कि सिपरी और दुनिया की अन्य दूसरी रक्षा संस्थाएं कभी भी कोई आधिकारिक डेटा जारी नहीं करतीं, बल्कि वे अनुमानों के आधार पर ही यह रिपोर्ट तैयार करती हैं.
कहां-कहां से डेटा लेती है सिपरी?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब यह सब इतना गुप्त है, तो सिपरी को यह जानकारी मिलती कैसे है. दरअसल सिपरी केवल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ओपन-सोर्स सामग्रियों और दस्तावेजों का ही इस्तेमाल करती है. इनके रिसर्चर अलग-अलग देशों के रक्षा श्वेत पत्र, संसद या कांग्रेस में पेश किए गए बजट और रिकॉर्ड्स का बारीकी से अध्ययन करते हैं. इन सरकारी दस्तावेजों में छिपे छोटे-छोटे सुरागों और कड़ियों को जोड़कर ही परमाणु हथियारों का यह सालाना अनुमानित आंकड़ा तैयार किया जाता है.
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ईंधन के भंडार से हथियारों की गिनती
सिपरी की गिनती का पहला और सबसे मुख्य पैमाना किसी भी देश के पास मौजूद यूरेनियम और प्लूटोनियम की मात्रा होती है. रिसर्चर यह हिसाब लगाते हैं कि किसी देश के पास हथियार बनाने के काम आने वाला कितना प्लूटोनियम और अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम मौजूद है. इस ईंधन भंडार की अधिकतम सीमा से यह पता चल जाता है कि उस देश के पास ज्यादा से ज्यादा कितने परमाणु वॉरहेड्स बनाने की क्षमता है. इसके बाद वे उस देश की हथियार डिजाइनिंग तकनीक के आधार पर यह तय करते हैं कि कुल ईंधन का कितना हिस्सा असल हथियारों में बदला गया होगा.
लॉन्चिंग सिस्टम और मिसाइलों पर नजर
केवल परमाणु बम बना लेना ही काफी नहीं होता, उसे दागने के साधन भी होने चाहिए. सिपरी अपनी गिनती को पुख्ता करने के लिए उन मिसाइल साइलो, परमाणु पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों की संख्या की जांच करती है जो परमाणु हमला करने में सक्षम हैं. इन लॉन्चिंग सिस्टम की क्षमता और संख्या के आधार पर ही परमाणु वॉरहेड्स के चालू होने, अतिरिक्त रखे होने या फिर गोदाम में सुरक्षित होने का सटीक वर्गीकरण किया जाता है. भारत के मामले में भी इसी गणित से 12 हथियारों की तैनाती की बात सामने आई है.
आसमान से सैटेलाइट की पैनी नजर
तकनीक के इस दौर में अब कुछ भी छिपाना आसान नहीं रह गया है. सिपरी व्यवसायिक तौर पर मिलने वाली बेहद हाई-रिजॉल्यूशन वाली सैटेलाइट तस्वीरों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करती है. इन तस्वीरों के जरिए परमाणु देशों के मिसाइल अड्डों, पनडुब्बी बेस और सेना के सुरक्षा घेरों में होने वाले बदलावों को ट्रैक किया जाता है. अगर किसी नए मिसाइल साइलो का निर्माण हो रहा हो या किसी सैन्य बेस पर हलचल बढ़ी हो, तो सैटेलाइट इमेज के जरिए रिसर्चर तुरंत भांप जाते हैं कि वहां कोई बड़ा रणनीतिक बदलाव हो रहा है.
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