Muslim Women Namaz: भारत का सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़े कई महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर सुनवाई की तैयारी कर रहा है.  यह दोनों अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन से संबंधित हैं. यह मामला मूल रूप से केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर विवाद से शुरू हुआ था. लेकिन अब चर्चा का एक मुख्य विषय यह बन चुका है कि क्या मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों की तरह मस्जिद के अंदर नमाज पढ़ने का समान अधिकार होना चाहिए? इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या भारतीय मुस्लिम महिला पहली पंक्ति में नमाज नहीं पढ़ सकती. 

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क्या कहती हैं इस्लामी परंपराएं?

दुनिया के कई हिस्सों में अपनाई जाने वाली पारंपरिक इस्लामी प्रथाओं के मुताबिक जब सामूहिक नमाज में पुरुष भी मौजूद होते हैं तो महिलाएं आमतौर पर पहली कतार में खड़ी नहीं होती हैं. इस्लामी विद्वान और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठन यह तर्क देते हैं कि यह व्यवस्था भेदभाव पर आधारित न होकर लंबे समय से चली आ रही धार्मिक रीति रिवाज पर आधारित है. 

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कई मस्जिदों में पुरुष आगे की कतारों में खड़े होते हैं. साथ ही महिलाएं उनके पीछे या फिर विशेष रूप से महिलाओं के लिए तय किए गए अलग हिस्सों में नमाज पढ़ती हैं. 

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हदीस और नमाज की कतार 

मौजूदा व्यवस्था के समर्थक अक्सर हदीस का हवाला देते हैं. उनके मुताबिक मिश्रित सामूहिक नमाज के दौरान पुरुषों के लिए आगे की कतार सबसे अच्छी मानी जाती है. वहीं महिलाओं के लिए पीछे की कतार बेहतर मानी जाती है. धार्मिक विद्वानों का यह तर्क है कि यह व्यवस्था इबादत के दौरान अनुशासन और अलगाव बनाए रखने के लिए बनाई गई थी. क्योंकि नमाज का नेतृत्व करने वाले इमाम आगे खड़े होते हैं इस वजह से पारंपरिक रूप से कतारों को इस तरह से व्यवस्थित किया जाता है कि पुरुष आगे और महिलाएं पीछे रहें.

सुप्रीम कोर्ट के सामने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का पक्ष 

सुनवाई के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अदालत को बताया कि इस्लाम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश करने या फिर नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगाता. हालांकि उसने यह तर्क दिया की नमाज की व्यवस्था से जुड़े कुछ धार्मिक रीति रिवाज इस्लामी परंपरा और आंतरिक धार्मिक प्रबंधन का हिस्सा हैं.  बोर्ड ने इस बात पर भी जोर दिया कि इस्लाम सामूहिक इबादत के दौरान पुरुषों और महिलाओं के बीच बिना किसी रोक-टोक के मेल जोल को हतोत्साहित करता है. यही वजह है कि मस्जिदों के अंदर महिलाओं के लिए अक्सर नमाज की अलग जगह बनाई जाती है.

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