Delimitation India: संसद के मानसून सत्र में अब सिर्फ चार कामकाजी दिन बचे हैं. साथ ही कई बड़े बिलों की स्थिति अभी भी साफ नहीं है. सरकार और विपक्ष अभी तक महिला आरक्षण, परिसीमन और विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम से जुड़े प्रस्ताव पर किसी सहमति पर नहीं पहुंच पाए हैं. इस राजनीतिक अनिश्चितता के बीच भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बारे में एक बड़ा सवाल भी उठता है. संसद का एक सदस्य कितने लोगों का प्रतिनिधित्व करता है? आइए जानते हैं भारत और अमेरिका के बीच के इस फर्क के बारे में.

Continues below advertisement

भारत का एक सांसद कितने लोगों का प्रतिनिधित्व करता है?

भारत में अभी लोकसभा की 543 चुनी हुई सीटें हैं. देश की इतनी बड़ी आबादी को देखते हुए लोकसभा का एक सांसद औसतन लगभग 25 से 27 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है. दूसरे बड़े लोकतंत्रों की तुलना में आबादी और प्रतिनिधि का यह अनुपात काफी ज्यादा है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों में कुछ संसदीय क्षेत्रों की आबादी 30 लाख से भी ज्यादा है.

Continues below advertisement

इतना बड़ा संसदीय क्षेत्र सांसदों के लिए एक बड़ी चुनौती पैदा करता है. लाखों मतदाताओं के साथ नियमित संपर्क बनाए रखना, स्थानीय समस्याओं को समझना और लोगों की व्यक्तिगत शिकायतों का समाधान करना काफी मुश्किल हो जाता है. 

भारत में लोकसभा की सीटें अभी भी 543 क्यों हैं?

एक बड़ी वजह भारत में लंबे समय से परिसीमन पर लगी रोक है. लोकसभा सीटों का बंटवारा ऐतिहासिक रूप से 1971 की जनगणना से जुड़ा हुआ है.  इसी के साथ तब से भारत की आबादी में भारी बढ़ोतरी हुई है. 

इस रोक का मकसद आंशिक रूप से इस बात को पक्का करना था कि जिन राज्यों ने आबादी की बढ़ोतरी को सफलतापूर्वक कंट्रोल किया है खासकर दक्षिण भारत में, वह कम आबादी वृद्धि की वजह से अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व ना खो दें. यही वजह है कि लोकसभा सीटों की संख्या में कोई भी बदलाव नहीं हुआ है. साथ ही भारत की आबादी में भी काफी बढ़ोतरी हुई है. 

अमेरिका में हाउस के 435 सदस्य 

अमेरिका में भी उसके निचले सदन में प्रतिनिधियों की संख्या तय है. अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में वोट देने वाले 435 सदस्य हैं.  औसतन अमेरिका का एक प्रतिनिधि लगभग 7,60,00 से 7,80,000 लोगों का प्रतिनिधित्व करता है. इसका मतलब है कि भारत का एक लोकसभा सांसद, अमेरिका के हाउस के एक औसत सदस्य की तुलना में लगभग तीन से साढ़े तीन गुना ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता है.

इस अंतर का सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि कानून बनाने वाले अपने क्षेत्र के लोगों के साथ कैसे बातचीत करते हैं. साथ ही अपने संसदीय क्षेत्र की जिम्मेदारियों को कैसे संभालते हैं.

अमेरिका में सिर्फ 435 सीटें क्यों?

शुरुआत में अमेरिका में प्रतिनिधित्व को लेकर ज्यादा लचीला तरीका अपनाया जाता था. लेकिन 1929 के परमानेंट अपोर्शनमेंट एक्ट ने हाउस के सदस्यों की संख्या को 435 पर‌ तय कर दिया. हालांकि भारत के उलट अमेरिका में राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा ऐसा नहीं रहता. हर 10 साल में होने वाली जनगणना के बाद आबादी में बदलाव के आधार पर 435 सीटों को राज्यों के बीच फिर से बांटा जाता है.

यह भी पढ़ेंः इस देश के पास है दुनिया का सबसे खतरनाक टैंक, आधुनिक युद्ध में यह कितना सफल?

छोटे चुनाव क्षेत्र का मतलब है लोगों से ज्यादा जुड़ाव

अमेरिका में चुनाव क्षेत्रों का औसत आकार छोटा होने से लोगों से सीधे जुड़ना कुछ आसान हो जाता है. अमेरिकी सांसद अक्सर मतदाताओं से बातचीत करने के लिए टाउन हॉल मीटिंग, सार्वजनिक कार्यक्रम और लोगों की मदद के लिए कार्यक्रम आयोजित करते हैं. 

भारतीय सांसद भी जनसभाएं करते हैं और अपने चुनाव क्षेत्रों का दौरा करते हैं. लेकिन 25 लाख से ज्यादा लोगों की आबादी को संभालना एक काफी बड़ी लॉजिस्टिकल चुनौती होती है. इस वजह से अंतर सिर्फ आबादी का नहीं है. इसका असर इस बात पर भी पड़ता है कि चुने हुए प्रतिनिधि नागरिकों के साथ कितनी अच्छी तरह से संपर्क बनाए रख सकते हैं.

अमेरिका की व्यवस्था में भी पूरी तरह से बराबर प्रतिनिधित्व नहीं मिलता. अंतर इस वजह से बना रहता है क्योंकि हर राज्य को हाउस में कम से कम एक प्रतिनिधि की गारंटी दी गई है. जैसे व्योमिंग की आबादी कम है और वहां से हाउस में एक प्रतिनिधि है. जबकि ज्यादा आबादी वाले राज्यों में कई प्रतिनिधि होते हैं.

यह भी पढ़ेंः ईरान-अमेरिका युद्ध में क्यों नहीं खत्म होते हथियार, कितना बड़ा है जखीरा?