Mangal Pandey Death Anniversary 2025: व्यापार करने आए अंग्रेजों ने देश पर करीब दो सौ सालों तक राज किया. सन 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पहला विद्रोह किया गया इसे आजादी की पहली लड़ाई कहा गया. हालांकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने आजादी की इस पहली लड़ाई को विद्रोह का नाम दिया और आज के दिन यानी 8 अप्रैल 1857 को अंग्रेजो के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने वाले मंगल पांडे को फांसी की सजा दी गई.

मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में एनफील्ड रायफल की कारतूस जिसको गाय और सुअर की चर्बी से ग्रीस किया गया था उसे चलाने से मना कर दिया. उन्होंने इसका विरोध करते हुए बैरकपुर छावनी में अंग्रेज अफसर के ऊपर गोली चलाई और बाकी साथियों से भी ऐसा करने के लिए कहा. मंगल पांडे को गिरफ्तार कर लिया गया और उनका कोर्ट मार्शल करके 18 अप्रैल 1857 को उनको फांसी की सजा सुनाई गई. 

हालांकि, फांसी की तय तारीख से पहले अंग्रेजों ने बगावत के डर से उन्हें दस दिन पहले ही फांसी दे दी. मंगल पांडे को जिस दिन फांसी दी गई उस देश एक महान स्वतंत्रता सेनानी ने जन्म लिया, जिसने आगे चलकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की. चलिए जानते हैं देश के उस महान स्वतंत्रता सेनानी के बारे में...

श्‍यामजी कृष्‍ण वर्माश्यामजी कृष्‍ण वर्मा का जन्म  4 अक्टूबर 1857 में गुजरात के कच्छ जिले में हुआ था. श्‍यामजी संस्कृति सहित कई भाषाओं के विद्वान थे. भारत की आजादी में उनकी अहम भूमिका रही है. उन्होंने लंदन में इंडियन हाउस रूल सोसाइटी और इंडियन हाउस एंड द इंडियन सोशलिस्ट की स्थापना की थी. इंडिया हाउस वह स्थान था जहां भारतीय छात्रों को पनाह मिलती थी और उन्हें राष्ट्रवाद की प्रेरणा दी जाती थी.

The Indian Sociologist में उन्होंने ब्रिटिश सरकार की आलोचना की और स्वतंत्रता की मांग को तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया. श्‍यामजी कृष्‍ण वर्मा मुंबई आर्य समाज के पहले प्रेसिडेंट थे. बताया जाता है कि श्यामजी वीर सावरकर से काफी प्रभावित थे जो उस समय लंदन में इंडियन हाउस के सदस्य थे. 

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