Meteorites: हर साल हजारों उल्कापिंड पृथ्वी से टकराते हैं. लेकिन काफी कम लोग ही उन्हें देख पाते हैं. वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि हर साल लगभग 17000 उल्कापिंड पृथ्वी के वायुमंडल से गुजर कर पृथ्वी की सतह तक पहुंचते हैं. इतनी बड़ी संख्या के बावजूद भी ज्यादातर उल्कापिंडों पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.

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17000 उल्कापिंड पृथ्वी तक पहुंचते हैं 

वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि हर साल लगभग 17000 उल्कापिंड पृथ्वी पर गिरते हैं. ये उल्कापिंड अंतरिक्ष की चट्टानों के टुकड़े होते हैं जो पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते समय पैदा होने वाली तेज गर्मी को झेल कर जमीन से टकराते हैं. हालांकि यह संख्या काफी बड़ी लग सकती है लेकिन इनमें से काफी कम उल्कापिंड ही मिल पाते हैं या फिर उन पर स्टडी हो पाती है. 

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ज्यादातर उल्कापिंड काफी छोटे होते हैं 

उल्कापिंडों पर ध्यान न जाने की सबसे बड़ी वजह उनका आकार है. जब वे तेज रफ्तार से पृथ्वी के वायुमंडल में आते हैं तो घर्षण से काफी ज्यादा गर्मी पैदा होती है. इससे उनका 90% से ज्यादा मास जलकर खत्म हो जाता है.

ज्यादातर उल्कापिंड जो जमीन तक पहुंचते हैं उनका वजन कुछ 100 ग्राम से लेकर कुछ किलोग्राम तक ही होता है. इससे उन्हें आम चट्टानों से अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है. 

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कहां गिरते हैं ज्यादातर उल्कापिंड?

उल्कापिंडों के कम दिखाई देने में पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति भी एक बड़ी भूमिका निभाती है. क्योंकि समुद्र पृथ्वी का लगभग 71% हिस्सा घेरे हुए है इस वजह से हर साल हजारों उल्कापिंड सीधे समुद्र में ही गिरते हैं. वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि हर साल लगभग 6100 उल्कापिंड समुद्रों में गिरते हैं. कई दूसरे उल्कापिंड रेगिस्तान में, जंगल, पर्वत श्रृंखला या फिर ध्रुवीय क्षेत्र में गिरते हैं.

दिन की रोशनी उन्हें छिपा देती है 

उल्कापिंड हमेशा साफ रात के आसमान में ही दिखाई नहीं देते. कई उल्कापिंड दिन के समय वायुमंडल में आते हैं. उस वक्त तेज सूरज की रोशनी की वजह से उनके चमकते हुए निशान को देखना नामुमकिन हो जाता है. यहां तक की रात में भी घने बादल, बारिश या फिर कोहरा आसमान में तेजी से गुजरते उल्कापिंड को देखने में बाधा डाल सकते हैं.

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