भारत में वाहन प्रदूषण को कम करने की दिशा में BS-VII उत्सर्जन मानकों की तैयारी शुरू हो चुकी है, लेकिन इन्हें लागू करने से पहले ही ऑटो इंडस्ट्री और सरकार के बीच एक अहम मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है. वाहन निर्माता चाहते हैं कि प्रस्तावित नियमों में ब्रेक और टायर से निकलने वाले प्रदूषण पर लागू होने वाली पाबंदियों को जल्दबाजी में लागू न किया जाए. इंडस्ट्री संगठन SIAM ने इन प्रावधानों के लिए अप्रैल 2035 का समय सुझाया है, ताकि कंपनियों और ऑटो-पार्ट्स सप्लायर्स को तकनीकी तैयारी के लिए पर्याप्त वक्त मिल सके.
यह मांग ऐसे समय सामने आई है जब सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 13 अक्टूबर को BS-VII का ड्राफ्ट प्रस्ताव जारी किया है. प्रस्तावित व्यवस्था में पहली बार प्रदूषण की तस्वीर को केवल इंजन के एग्जॉस्ट तक सीमित नहीं रखा गया है. ब्रेक से निकलने वाले सूक्ष्म कण, टायर घिसने से बनने वाले पार्टिकल्स और इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी की टिकाऊ क्षमता जैसे पहलुओं को भी व्यापक नियमों के दायरे में लाने की तैयारी है.
ब्रेक और टायर का प्रदूषण
आमतौर पर वाहन प्रदूषण की बात होने पर इंजन से निकलने वाले धुएं के बारे में ही बात होती है. लेकिन कार चलने के दौरान ब्रेक पैड और डिस्क के बीच घर्षण से भी बेहद छोटे कण हवा में मिलते हैं. इसी तरह सड़क पर लगातार चलने से टायर की सतह घिसती है और उससे भी सूक्ष्म कण निकलते हैं. खास बात यह है कि इलेक्ट्रिक कारें भी इस तरह के नॉन-एग्जॉस्ट प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं. EV में टेलपाइप उत्सर्जन नहीं होता, लेकिन ब्रेक और टायर से निकलने वाले कणों की समस्या बनी रहती है. BS-VII इसी वजह से वाहन प्रदूषण को देखने का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
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अप्रैल 2035 तक की समय सीमा
मौजूदा प्रस्ताव के मुताबिक यात्री कारों के लिए ब्रेक पार्टिकल उत्सर्जन पर चरणबद्ध सीमा लागू करने की योजना है. अप्रैल 2031 से बैटरी इलेक्ट्रिक कारों के लिए PM10 की सीमा 3 mg/km, जबकि अन्य संबंधित पावरट्रेन के लिए 7 mg/km प्रस्तावित है. अप्रैल 2035 से सभी कवर किए गए यात्री वाहनों के लिए 3 mg/km की समान सीमा का प्रस्ताव है. टायर से होने वाले घिसाव के लिए भी नियम प्रस्तावित हैं.
कंपनियां मांग रही हैं ज्यादा समय
ऑटो कंपनियों की मुख्य चिंता नियमों के उद्देश्य से ज्यादा टाइमलाइन और तकनीकी स्पष्टता को लेकर है. वाहन निर्माता चाहते हैं कि अंतिम उत्सर्जन सीमा, टेस्टिंग प्रक्रिया और अनुपालन की पूरी तकनीकी व्यवस्था पहले स्पष्ट हो. इसके बाद ब्रेक और टायर बनाने वाली कंपनियों को अपने मौजूदा उत्पादों की जांच करनी होगी. जरूरत पड़ने पर नई तकनीक का इस्तेमाल भी करना पड़ सकता है. वहीं इन पार्ट्स को वाहन के साथ जोड़कर दोबारा टेस्ट करना होगा.
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