भारत में कार खरीदना स्टेटस सिंबल और जरूरत दोनों से जुड़ा है. लोग बड़ी उम्मीदों से अपनी पसंद की गाड़ी घर लाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग कार खरीदते समय उसके डेप्रिसिएशन पर ध्यान देते हैं. समय के साथ गाड़ी की कीमत का कम होना ही डेप्रिसिएशन है. जैसे ही एक नई कार शोरूम से बाहर कदम रखती है, उसकी रीसेल वैल्यू तेजी से गिरने लगती है. पांच साल का समय पूरा होते-होते कार की वैल्यू इतनी कम हो जाती है कि पुरानी कारों के बाजार में उसकी असल कीमत आधी भी नहीं मिलती. आइए जानते हैं कि हर साल कार की कीमत किस तरह और क्यों घटती है.

Continues below advertisement

शोरूम से निकलते ही लग जाता है पहला झटका

जब आप डीलर से कार की चाबी लेते हैं और गाड़ी को सड़क पर लाते हैं, तो पहले ही मिनट में उसकी रीसेल वैल्यू करीब 5 से 10 फीसदी तक कम हो जाती है. गाड़ी चाहे सिर्फ 2 किलोमीटर ही क्यों न चली हो, लेकिन कागजों पर वह सेकंड हैंड कार बन जाती है.

इसके बाद जैसे ही कार अपना पहला साल पूरा करती है, उसकी कीमत में 15 से 20 फीसदी तक की बड़ी गिरावट आ जाती है. उदाहरण के लिए, अगर आपने 10 लाख रुपये की कार खरीदी है, तो महज एक साल बाद उसकी कीमत घटकर करीब 8 लाख रुपये के आसपास रह जाएगी.

Continues below advertisement

पांच साल में आधी से भी कम रह जाती है कीमत

पहले साल के बाद भी कार की कीमत घटने का यह सिलसिला थमता नहीं है. दूसरे, तीसरे और चौथे साल में कार की वैल्यू हर साल लगभग 10 से 15 फीसदी की रफ्तार से लगातार कम होती रहती है. जब कोई कार सड़क पर चलते हुए अपने 5 साल पूरे कर लेती है, तो वह अपनी शुरुआती ऑन-रोड कीमत का करीब 50 से 60 फीसदी हिस्सा खो चुकी होती है. इसका मतलब यह हुआ कि 5 साल पुरानी गाड़ी को दोबारा बेचने पर आपको उसकी मूल कीमत का सिर्फ 40 से 50 फीसदी पैसा ही वापस मिल पाएगा.

आखिर क्यों इतनी तेजी से कम होती है वैल्यू?

कार की कीमत कम होने का सबसे बड़ा कारण है गाड़ी का लगातार इस्तेमाल होना, जिससे उसके टायर, ब्रेक पैड, इंजन के कल्पुर्जे और सस्पेंशन धीरे-धीरे घिसने लगते हैं. दूसरा कारण है ऑटोमोबाइल मार्केट में आने वाली नई टेक्नोलॉजी. पांच साल के अंदर कार कंपनियां उसी मॉडल का नया और बेहतर फेसलिफ्ट वेरिएंट बाजार में उतार देती हैं. नए फीचर्स और आधुनिक डिजाइन आने की वजह से पुराना मॉडल आउटडेटेड हो जाता है, जिससे पुरानी गाड़ी के खरीदार कम पैसे लगाना पसंद करते हैं.

यह भी पढ़ें: ट्रैवल बिजनेस में करनी है0 एंट्री, जानिए कितने रुपये की आएगी एक वॉल्वो बस?

ब्रांड और कार के रंग का भी पड़ता है असर

भारतीय बाजार में हर गाड़ी की कीमत एक जैसी रफ्तार से नहीं घटती. मारुति सुजुकी, हुंडई और टोयोटा जैसे स्थापित ब्रांड्स की कारों की रीसेल वैल्यू बाकी कंपनियों के मुकाबले बेहतर रहती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इनके सर्विस सेंटर आसानी से मिल जाते हैं और स्पेयर पार्ट्स भी सस्ते होते हैं.

इसके अलावा, कार का रंग भी कीमत तय करने में भूमिका निभाता है. सफेद, सिल्वर और ग्रे जैसे सदाबहार रंगों की गाड़ियों को रीसेल मार्केट में जल्दी खरीदार मिल जाते हैं, इसलिए इनकी कीमत चटक रंगों वाली कारों के मुकाबले थोड़ी ज्यादा बनी रहती है.

यह भी पढ़ें: Mercedes की नई इलेक्ट्रिक SUV का जलवा, 2.5 सेकंड में पकड़ेगी 100 की रफ्तार


Car loan Information:

Calculate Car Loan EMI