Milk to Curd Business:  गांव हो या शहर, हर गली मोहल्ले में डेयरी की दुकान पर दही की डिमांड हमेशा बनी रहती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि डेयरी वाले सीधे दूध बेचने की बजाय उसे दही में बदलकर क्यों बेचते हैं? दरअसल इसके पीछे मुनाफे का पूरा गणित छुपा है. आइए समझते हैं कि 100 लीटर दूध से कितना दही तैयार होता है, और डेयरी कारोबारी इससे कितनी कमाई कर लेते हैं.

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100 लीटर दूध से कितना दही बनता है?

दूध को दही में बदलने के पीछे एक बायोकेमिकल प्रोसेस काम करता है. जामन डालते ही दूध में मौजूद लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया लैक्टोज को फर्मेंट करके लैक्टिक एसिड में बदल देते हैं, जिससे दूध का प्रोटीन जमकर दही का रूप ले लेता है. ये प्रोसेस कुछ ही घंटों में पूरा हो जाता है, और खास बात ये है कि इस दौरान दूध का वजन या मात्रा लगभग उतनी ही बनी रहती है, यानी 100 लीटर दूध से करीब करीब उतनी ही मात्रा में दही तैयार हो जाता है, बस थोड़ी बहुत प्रोसेसिंग लॉस को छोड़कर.

दूध बेचने से ज्यादा दही में क्यों है मुनाफा

कच्चा दूध बेचने पर मार्जिन काफी सीमित रहता है, क्योंकि दूध की कीमत ज्यादातर बाजार दर और क्वालिटी से बंधी होती है. लेकिन जब वही दूध दही, पनीर या घी जैसे प्रोसेस्ड प्रोडक्ट में बदल जाता है, तो उसकी कीमत सीधे बढ़ जाती है. यही वजह है कि ज़्यादातर डेयरी कारोबारी दूध को सीधे बेचने की बजाय प्रोसेस करके बेचना ज्यादा फायदेमंद मानते हैं.

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प्रोबायोटिक डिमांड ने बढ़ाई दही की बिक्री

आजकल दही की डिमांड सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता की वजह से भी तेज़ी से बढ़ रही है. लोग प्रोबायोटिक्स के पाचन संबंधी फायदों को लेकर ज्यादा जागरूक हो रहे हैं, जिससे दही की मांग साल भर बनी रहती है, खासकर गर्मियों के मौसम में इसकी खपत और भी ज्यादा हो जाती है. 

छोटे डेयरी कारोबार के लिए फायदे का सौदा

यही वजह है कि गांव कस्बों में छोटे स्तर पर भी लोग दूध इकट्ठा करके उसे दही में बदलकर बेचना पसंद करते हैं.  कम पूंजी में शुरू होने वाला ये कारोबार स्थानीय बाजार में अच्छी कमाई का जरिया बन जाता है, क्योंकि प्रोसेसिंग लागत सीमित होती है जबकि बिक्री कीमत दूध के मुकाबले काफी बेहतर मिलती है. 

घर में जमाई दही से भी कमाई का मौका

कई डेयरी कारोबारी अपने घर पर ही बड़े बर्तनों में दही जमाकर सीधे स्थानीय दुकानों और ग्राहकों तक सप्लाई करते हैं. इससे बिचौलियों का खर्च बचता है और मुनाफे का बड़ा हिस्सा सीधे कारोबारी की जेब में जाता है, जिससे छोटे स्तर पर भी अच्छी कमाई हो जाती है. 

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