आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में जब भी कोई नई क्रांति का जिक्र होता है, तो सबकी नजर एल्गोरिदम और सॉफ्टवेयर पर जाती है. हालांकि, सच्चाई यह है कि AI कोई जादू नहीं, बल्कि सिलिकॉन और बिजली से चलने वाला एक बेहद महंगा 'फिजिकल इंजन' है. AI के लिए दो चीजें सबसे ज्यादा जरूरी हैं- हाई-एंड चिप्स (कंप्यूटिंग पावर) और बेशुमार बिजली (ऊर्जा). इन दोनों मोर्चों पर जब हम ताजा आंकड़ों के आईने में दुनिया को देखते हैं, तो तस्वीर बेहद चौंकाने वाली और साफ नजर आती है.
अमेरिका चिप्स के मामले में दुनिया की करीब 72% कंप्यूटिंग पावर अपने पास रख चुका है. चीन घरेलू चिप बनाने की जद्दोजहद में फंसा है. यूरोप इस दौड़ में कहीं पीछे छूटता दिख रहा है और भारत सिर्फ 1.6% वैश्विक कंप्यूट शेयर के साथ शुरुआती पायदान पर खड़ा है. यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत की लड़ाई है. एक्सप्लेनर में बारीकी से समझते हैं कि कौन कहां खड़ा है और भारत के लिए असली चुनौती क्या है...
चिप (कंप्यूटिंग पावर): अमेरिका की बढ़त और चीन की मजबूरी
AI के लिए जरूरी हाई-एंड चिप्स में अमेरिका की पकड़ बाकी दुनिया से बहुत आगे है. Epoch AI के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में दुनिया भर में जो भी नई AI कंप्यूटिंग कैपेसिटी जोड़ी गई, उसका करीब 78% हिस्सा अकेले अमेरिका के खाते में गया.
चीन की स्थिति थोड़ी पेचीदा है. अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से चीन को सबसे आधुनिक चिप्स (जैसे Nvidia) आसानी से नहीं मिल पाते. नतीजतन, 2026 में चीन अपने देश में जितनी AI चिप्स बना सकता है, वह अमेरिका के कुल उत्पादन का सिर्फ 1-2% ही है. हालांकि, मजबूरी में चीन ने अपना घरेलू बाजार विकसित करना शुरू कर दिया है.
अनुमान है कि 2026 तक चीन के अपने AI चिप बाजार में घरेलू कंपनियों की हिस्सेदारी 50% तक पहुंच जाएगी. तकनीकी तौर पर वे अभी अमेरिका से काफी पीछे हैं और उन्हें सबसे एडवांस मशीनरी (EUV लिथोग्राफी) न मिलने की वजह से रफ्तार धीमी है.
यूरोप चिप निर्माण में ऐतिहासिक रूप से कमजोर रहा है. वैश्विक सेमीकंडक्टर उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी 10% से भी कम है, हालांकि EU का लक्ष्य 2030 तक इसे 20% करने का है. भारत की स्थिति अभी बहुत शुरुआती है. देश में Tata का गुजरात प्लांट और HCL-Foxconn की नोएडा यूनिट सेमीकंडक्टर बनाने की शुरुआत कर रही है, लेकिन ये परियोजनाएं अभी शुरुआती दौर में हैं और इनमें देरी भी हो रही है.
बिजली: AI की भूख और उसका असर
AI डेटा सेंटर बिजली के बहुत बड़े उपभोक्ता हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक, दुनिया भर में डेटा सेंटरों की बिजली खपत 2024 के करीब 415 TWh से बढ़कर 2030 तक लगभग 945 TWh हो जाएगी. इस बढ़ोतरी का करीब 80% हिस्सा अकेले अमेरिका और चीन का होगा.
अगर 2024 से 2030 के बीच बिजली की मांग में होने वाली बढ़ोतरी को देखें, तो:
- अमेरिका: अनुमानित 240 TWh की अतिरिक्त मांग है, यानी 2024 के स्तर से 130% की बढ़ोतरी. प्रति व्यक्ति डेटा सेंटर बिजली खपत के मामले में अमेरिका दुनिया में सबसे आगे है. 2024 में 540 kWh, जो 2030 तक 1,200 kWh से ज्यादा होने का अनुमान है.
- चीन: अनुमानित 175 TWh की अतिरिक्त मांग है, यानी 170% की बढ़ोतरी.
- यूरोप: अनुमानित 45 TWh की अतिरिक्त मांग है, यानी 70% की बढ़ोतरी.
भारत की स्थिति अभी छोटी है, लेकिन वह तेजी से बढ़ने की तैयारी में है. 2025 में देश की डेटा सेंटर क्षमता करीब 1.5 GW थी, जो 2030 तक बढ़कर 10 GW तक पहुंच सकती है. इससे बिजली की मांग लगभग 57 TWh तक पहुंचने का अनुमान है.
भारत सरकार की आर्थिक समीक्षा में यह भी स्वीकार किया गया है कि बिजली, पानी और वित्त जैसी बुनियादी चीजें AI इंफ्रास्ट्रक्चर के तेजी से विस्तार में 'बाधा' बन सकती हैं.
भारत के लिए असली चुनौती क्या है?
भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी IT प्रतिभा है, लेकिन AI का खेल सिर्फ सॉफ्टवेयर या सर्विसेज का नहीं है. यह हार्डवेयर (चिप) और ऊर्जा (बिजली) का खेल है. गूगल, अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने भारत में AI और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 67.5 बिलियन डॉलर से ज्यादा के निवेश का ऐलान किया है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर भारत खुद के सेमीकंडक्टर और पर्याप्त बिजली-पानी की व्यवस्था नहीं कर पाता, तो वह सिर्फ विदेशी AI सिस्टमों को होस्ट करने वाला देश बनकर रह जाएगा, न कि अपनी खुद की AI ताकत बनाएगा.
कुल मिलाकर चिप में अमेरिका की बढ़त लगातार बढ़ रही है, बिजली में भी वह सबसे आगे है. चीन दोनों मोर्चों पर अपनी घरेलू क्षमता बढ़ाने की जद्दोजहद में है. यूरोप दोनों में पीछे है और भारत के पास बड़ा अवसर है, लेकिन जमीन पर उतारने के लिए चिप निर्माण और ऊर्जा सुरक्षा दोनों में ठोस कदम उठाने होंगे.
