आज के दौर में तकनीक इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि साइंस फिक्शन फिल्मों जैसी चीजें हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनती जा रही हैं. बाजार में ऐसे स्टाइलिश चश्मे आ चुके हैं जो दिखने में तो आम चश्मे जैसे लगते हैं. लेकिन उनके अंदर छिपा छोटा सा कैमरा और AI किसी की भी चुपचाप वीडियो रिकॉर्डिंग कर सकता है. स्मार्ट ग्लास दिखने में आम चश्मे जैसे होते हैं. लेकिन इनमें कैमरा, माइक्रोफोन और AI जैसे फीचर्स हो सकते हैं. 

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जो आम इंसान की पर्सनल प्राइवेसी के लिए खतरा साबित हो रहा है. इसी बड़े खतरे को देखते हुए नॉर्वे की डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी ने एक बहुत बड़ा और कड़ा कदम उठाने का फैसला किया है. नॉर्वे में इन AI स्मार्ट ग्लासेज के पब्लिक इस्तेमाल पर रोक लगाने की तैयारी चल रही है. सरकार का मानना है कि हर नागरिक को यह हक और भरोसा होना चाहिए कि कोई सार्वजनिक पार्क, जिम, या अस्पताल में उसकी मर्जी के बिना वीडियो या तस्वीरें न खींच रहा हो. 

आम इंसान की प्राइवेसी के लिए खतरा

आज के दौर में Meta जैसे बड़े ब्रांड्स के स्मार्ट ग्लासेज मार्केट में खूब देखने को मिल रहे हैं. जिनमें कैमरे और माइक के साथ तगड़े AI फीचर्स दिए जाते हैं. कंपनियां भले ही यह दावा करती हैं कि रिकॉर्डिंग के दौरान चश्मे पर एक छोटी सी एलईडी लाइट जलती है जिससे सामने वाले को पता चल जाए लेकिन भीड़भाड़ वाली जगहों पर उस छोटी सी लाइट को नोटिस करना लगभग नामुमकिन होता है. 

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नॉर्वे के अधिकारियों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि लोग पार्क, शॉपिंग मॉल, बीच या सड़कों पर बेखौफ घूमते हैं और कोई दूसरा इंसान सामान्य दिखने वाले चश्मे से उनकी हर हरकत को रिकॉर्ड करके इंटरनेट पर लीक कर सकता है. जो कि लोगों की पर्सनल प्राइवेसी पर सीधा हमला है. क्योंकि बिना की सहमति के किसी की पर्सनल ज़िंदगी के पलों को कैमरे में कैद करना कानूनन और नैतिक रूप से बेहद गलत है.

किन जगहों पर लग सकती है रोक?

नॉर्वे सरकार इस समस्या से निपटने के लिए नियमों को बेहद सख्त बनाने पर विचार कर रही है. जिसके तहत कुछ चुनिंदा जगहों और बड़े पब्लिक प्लेसेज पर इन स्मार्ट चश्मों के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लग सकती है. इस बैन के दायरे में स्कूल, बच्चों से जुड़े संस्थान, अस्पताल, डॉक्टर के क्लिनिक, जिम के चेंजिंग रूम और स्विमिंग पूल जैसी जगहें खासतौर पर शामिल हैं. जहां प्राइवेसी भंग होने का रिस्क सबसे ज्यादा होता है.

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी तरह से इन गैजेट्स को बैन कर दिया जाएगा. बल्कि सरकार का मकसद यह देखना है कि बिना रोक-टोक के बढ़ रहे इन कैमरों के आम लोगों पर क्या निगेटिव इंपैक्ट पड़ रहा है. इसके लिए प्राइवेसी और कानून से जुड़े विशेषज्ञ मिलकर इस टेक्नालाॅजी के नफे-नुकसान की स्टडी कर रहे हैं जिससे भविष्य के लिए और कड़े नियम तैयार किए जा सकें.

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क्या भारत जैसे देशों को भी ऐसे कानून की जरूरत है?

जब नॉर्वे जैसे विकसित देश में स्मार्ट ग्लासों को लेकर इतनी सख्ती बरती जा रही है,. तो सवाल यह उठता है कि क्या भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों को भी ऐसे कड़े नियमों की सख्त जरूरत है? भारत में टेक प्रोडक्ट्स और गैजेट्स का मार्केट बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है और लोग बिना किसी हिचकिचाहट के नए ट्रेंड्स को अपना रहे हैं. ऐसे में बिना किसी मजबूत प्राइवेसी कानून के लोग ऐसे खुफिया कैमरों वाले चश्मे पहनकर पब्लिक प्लेसेज जगहों, दफ्तरों या भीड़भाड़ वाले इलाकों में घूमने से आम आदमी की सेफ्टी और प्राइवेसी खतरे में पड़ रही है. 

हालांकि तकनीक के अपने फायदे भी हैं जैसे दिव्यांगों की मदद या रियल-टाइम ट्रांसलेशन लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पर्सनल फ्रीडम की कीमत पर किसी को भी दूसरों की प्राइवेसी में दखल देने की छूट दे दी जाए. देखना होगा नार्वे सरकार के इस फैसले के बाद भारत सरकार इस बारे में क्या कदम उठाती है.

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