Cyber Fraud: इंटरनेट और स्मार्टफोन ने लोगों की जिंदगी को काफी आसान बना दिया है. बैंकिंग से लेकर शॉपिंग और सरकारी सेवाओं तक, लगभग हर काम अब मोबाइल से किया जा सकता है, लेकिन डिजिटल सुविधाओं के बढ़ने के साथ साइबर अपराधियों ने भी ठगी के नए तरीके खोज लिए हैं. अब ऑनलाइन फ्रॉड करने के लिए अपराधियों को खुद तकनीकी विशेषज्ञ होने की जरूरत नहीं है. वे तैयार सॉफ्टवेयर और फर्जी ऐप किराए पर लेकर लोगों को निशाना बना रहे हैं. हाल ही में साइबर सिक्योरिटी कंपनी CloudSEK की एक जांच में ऐसे ही एक साइबर क्राइम नेटवर्क का खुलासा हुआ है, जिसका नाम MR ROBOT बताया गया है.
इस नेटवर्क की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहां ठगी के लिए इस्तेमाल होने वाले टूल किसी ऑनलाइन स्टोर की तरह उपलब्ध कराए जा रहे हैं. अपराधी अपनी जरूरत के हिसाब से फर्जी बैंकिंग ऐप और दूसरे मालवेयर खरीद या किराए पर ले सकते हैं. इसके लिए उन्हें खुद ऐप बनाने या तकनीकी जानकारी हासिल करने की जरूरत नहीं पड़ती. यानी साइबर ठगी अब एक बिजनेस मॉडल का रूप लेती जा रही है.
हैकर्स का अपना डिजिटल स्टोर
CloudSEK की रिपोर्ट के मुताबिक MR ROBOT नाम से चल रहा नेटवर्क Android यूजर्स को निशाना बनाने के लिए Malware-as-a-Service (MaaS) मॉडल का इस्तेमाल कर रहा है. यह एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें साइबर अपराधी दूसरे लोगों को ठगी के लिए तैयार सॉफ्टवेयर किराए पर देते हैं. इस नेटवर्क में Telegram बॉट और वेब कंट्रोल पैनल का इस्तेमाल किया जाता है. इसके जरिए अपराधी अपनी जरूरत के मुताबिक फर्जी ऐप तैयार करवा सकते हैं. जांच में करीब 36 तरह के फर्जी ऐप के कैटलॉग का पता चला है. इनमें अलग-अलग बैंकों, बिजली-पानी के बिल, गैस सेवाओं और ट्रैफिक चालान से जुड़े ऐप शामिल हैं. ये असली सरकारी या बैंकिंग सेवाओं की नकल करके लोगों को धोखा देना है.
किराए पर मिलते हैं ठगी के सॉफ्टवेयर
इस पूरे नेटवर्क में सबसे चिंताजनक बात यह है कि साइबर अपराधियों को तैयार मालवेयर उपलब्ध कराया जाता है. इसके लिए एक तरह का सब्सक्रिप्शन और एफिलिएट सिस्टम बनाया गया है. अलग-अलग अपराधियों को अपनी पहचान के लिए App ID दी जाती है और वे इसके जरिए कंट्रोल पैनल का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस व्यवस्था से ठगी करने वाले लोगों को तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत कम हो जाती है. वे तैयार टूल का इस्तेमाल करके अपने शिकार को निशाना बना सकते हैं.
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मोबाइल में ऐप इंस्टॉल होते ही शुरू हो जाता है खेल
इस तरह की ठगी में अपराधी लोगों को WhatsApp या दूसरे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए फर्जी APK फाइल भेजते हैं. कई बार इन ऐप को बैंक अपडेट, बिजली बिल भुगतान, पेंशन वेरिफिकेशन या ट्रैफिक चालान के नाम पर दिखाया जाता है. जैसे ही कोई व्यक्ति बिना जांच किए ऐप इंस्टॉल करता है और उसे जरूरी अनुमतियां दे देता है, तो उसका मोबाइल का डेटा खतरे में पड़ जाता है. कुछ मालवेयर SMS और OTP तक पहुंच बना लेते हैं. इसके अलावा फर्जी स्क्रीन के जरिए बैंकिंग जानकारी, कार्ड डिटेल और UPI PIN जैसी संवेदनशील जानकारियां भी चुराई जा सकती हैं. कुछ मामलों में बैंक से आने वाली कॉल को भी अपराधियों की तरफ डायवर्ट किया जा सकता है.
हजारों मोबाइल और बैंकिंग ग्राहकों पर नजर
CloudSEK की जांच में सामने आया कि इस नेटवर्क से जुड़े एक एफिलिएट के पास 153 संक्रमित मोबाइल फोन और 5,407 इंटरसेप्ट किए गए SMS का रिकॉर्ड था. जांच में यह भी पाया कि कई पीड़ितों के फोन में कॉल फॉरवर्डिंग एक्टिव थी. इससे पता चलता है कि अपराधी केवल मोबाइल में मौजूद जानकारी चुराने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बैंकिंग वेरिफिकेशन को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं.
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