चीन के वैज्ञानिकों ने बैटरी टेक्नोलॉजी में एक ऐसा एक्सपेरिमेंट किया है जो आने वाले समय में एनर्जी स्टोरेज की तस्वीर बदल सकता है. शोधकर्ताओं ने एक नई वॉटर-बेस्ड बैटरी तैयार की है जो लैब टेस्ट में करीब 1,20,000 चार्जिंग साइकल तक स्टेबल रही. वैज्ञानिकों के हिसाब से अगर इसे ग्रिड स्टोरेज में इस्तेमाल किया जाए तो यह सैद्धांतिक रूप से करीब 300 साल तक काम कर सकती है.

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मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह कोई ऐसी बैटरी नहीं है जिसे सिर्फ पानी भरकर चला दिया जाए. इसे aqueous battery कहा जा रहा है जिसमें पानी बेस्ड इलेक्ट्रोलाइट का इस्तेमाल होता है. इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने मैग्नीशियम और कैल्शियम के न्यूट्रल साल्ट वाला इलेक्ट्रोलाइट तैयार किया जिसका pH करीब 7 रखा गया. इससे बैटरी के अंदर होने वाली corrosive reactions को कम करने में मदद मिलती है.

1.2 लाख चार्जिंग साइकल का दावा

इस डिजाइन में एक खास covalent organic polymer (COP) को नेगेटिव इलेक्ट्रोड के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. वैज्ञानिकों ने कई अलग-अलग पॉलिमर स्ट्रक्चर की जांच के बाद Hex TADD COP को चुना. पॉजिटिव इलेक्ट्रोड के लिए Prussian blue analog का इस्तेमाल किया गया है.

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इस बैटरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी साइकल लाइफ है. टेस्टिंग के दौरान यह लगभग 120,000 charge-discharge cycles तक स्टेबल रही है. तुलना के लिए, आम रिचार्जेबल बैटरियों में समय के साथ क्षमता कम होने लगती है.

रिसर्च में दिए गए हिसाब के मुताबिक, अगर बैटरी को ग्रिड स्टोरेज में औसतन करीब 1.1 साइकल प्रतिदिन चलाया जाए तो 120,000 साइकल लगभग 300 साल के बराबर हो सकते हैं. हालांकि, यह 300 साल का आंकड़ा असली दुनिया में किसी बैटरी के 300 साल तक इस्तेमाल होने की गारंटी नहीं है बल्कि साइकल टेस्ट और इस्तेमाल दर पर बेस्ड सैद्धांतिक अंदाजा है.

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पर्यावरण के लिए भी अहम क्यों?

इस टेक्नोलॉजी का एक और फायदा इसकी सुरक्षा से जुड़ा है. शोधकर्ताओं ने जिस न्यूट्रल इलेक्ट्रोलाइट का इस्तेमाल किया है, वह जहरीला नहीं बताया गया है और इसे टोफू बनाने में इस्तेमाल होने वाले ब्राइन जैसे खनिजों से जोड़ा गया है. इससे बैटरी के डिस्पोजल से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताएं कम हो सकती हैं.

वहीं, पानी बेस्ड बैटरियों में आग लगने का खतरा भी लिथियम-आयन बैटरियों के मुकाबले में कम रहता है. इसी वजह से इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर एनर्जी स्टोरेज में फायदेमंद साबित हो सकता है.

क्या यह स्मार्टफोन की बैटरी को बदल देगी?

अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. इस तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती energy density है. पानी बेस्ड बैटरियां लंबे समय से सुरक्षा और कम लागत के लिए आकर्षक रही हैं लेकिन पोर्टेबल डिवाइस में जरूरी ज्यादा एनर्जी को कम वजन और कम जगह में स्टोर करना अभी भी चुनौती है.

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