जब रसूख और नेताओं की सिफारिशें काम नहीं आतीं, तब प्रशासनिक संवेदनशीलता ही आम आदमी के लिए आखिरी उम्मीद बनती है. यूपी के पीलीभीत से एक ऐसी ही झकझोर देने वाली खबर सामने आई है.

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यहां एक बेबस मां को अपने बीमार बेटे के इलाज के लिए अपनी चांदी की पायल बेचनी पड़ गई, क्योंकि सूबे के राज्यमंत्री संजय सिंह गंगवार की सिफारिशी चिट्ठी भी लखनऊ के बड़े अस्पताल (KGMU) में बेअसर साबित हुई. हालांकि, जब यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो जिलाधिकारी (DM) ने संवेदनशीलता की अनोखी मिसाल पेश की.

मंत्री की चिट्ठी KGMU में साबित हुई 'रद्दी'

मामला पीलीभीत के वल्लभनगर का है. यहां रहने वाली रामकली अपने बेटे श्याम सुंदर की किडनी के इलाज के लिए दर-दर भटक रही थी. बेटे की जान बचाने के लिए उसने राज्यमंत्री संजय सिंह गंगवार से गुहार लगाई. मंत्री ने मदद करते हुए लखनऊ के केजीएमयू (KGMU) अस्पताल के लिए एक सिफारिशी पत्र लिख दिया. लेकिन रामकली के लिए वह चिट्ठी अस्पताल के सिस्टम में महज रद्दी का टुकड़ा साबित हुई. अस्पताल की बेरुखी और आर्थिक तंगी से टूट चुकी मां को वापस पीलीभीत लौटने के लिए भारी मन से अपनी चांदी की पायल तक बेचनी पड़ गई.

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वायरल हुई बेबसी तो एक्शन में आए डीएम

सिस्टम की लाचारी और एक मां के पायल बेचने का दर्द जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो मंत्री की फजीहत होने लगी और प्रशासन में हड़कंप मच गया. मामले का संज्ञान लेते हुए पीलीभीत के जिलाधिकारी (DM) ज्ञानेंद्र सिंह तुरंत एक्शन में आए. वह एसडीएम (SDM) श्रद्धा सिंह और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की टीम के साथ सीधे पीड़ित महिला के घर पहुंच गए.

वापस लौटाई पायल, 50 हजार रुपये की दी मदद

डीएम ज्ञानेंद्र सिंह ने न सिर्फ परिवार का दुख साझा किया, बल्कि महिला का वह सम्मान भी वापस लौटाया जो उसने बेटे के लिए दांव पर लगाया था. डीएम के निर्देश पर एसडीएम ने रामकली को उसकी बिकी हुई पायल वापस दिलवाई. इसके साथ ही, रेड क्रॉस सोसाइटी की तरफ से परिवार को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी दी गई. प्रशासन ने आनन-फानन में परिवार का नया राशन कार्ड बनवाया और स्वास्थ्य विभाग को युवक के बेहतर से बेहतर इलाज के सख्त निर्देश दिए.

सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल

डीएम और प्रशासन की इस मानवीय पहल की हर तरफ जमकर तारीफ हो रही है. लेकिन इस घटना ने सिस्टम पर एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या अब आम आदमी के लिए मंत्रियों की सिफारिशों की कोई अहमियत नहीं बची है? क्या हर गरीब और लाचार व्यक्ति को मदद पाने के लिए अपने दर्द के 'सोशल मीडिया पर वायरल' होने का इंतजार करना पड़ेगा?

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