अयोध्या में राम मंदिर को लेकर इन दिनों जो हलचल मची हुई है, वह सिर्फ दान चोरी के विवाद तक सीमित नहीं है. 6 जुलाई 2026 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की जो बैठक हुई, उसने संगठन के 2020 में गठन के बाद से अब तक के सबसे बड़े प्रशासनिक बदलाव को अंजाम दिया. महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनील मिश्रा के इस्तीफे, अंतरिम महासचिव की नियुक्ति और पहली बार CEO पद बनाने का यह फैसला महज एक घटना का नतीजा नहीं है. यह एक पूरी व्यवस्था के संकट की कहानी है, जो अब देश के सबसे बड़े धार्मिक केंद्रों में से एक बन चुके मंदिर के लिए काफी नहीं रही...

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दान चोरी का मामला: कैसे हुआ खुलासा?

पूरा मामला तब शुरू हुआ जब मंदिर के एक पूर्व अकाउंट्स सुपरवाइजर ने दान में गड़बड़ी की शिकायत की. इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 जून 2026 को तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया. SIT की प्रारंभिक रिपोर्ट चौंकाने वाली थी. 27 अप्रैल से 5 जून 2026 के बीच के CCTV फुटेज में करीब 70 घटनाएं कैद हुईं, जिनमें नकदी गिनने वाले कर्मचारी अपने कपड़ों, जेबों और जूतों में नोटों की गड्डियां और ढीली नकदी छिपाते दिखे. SIT ने पाया कि ये चोरी की घटनाएं 'लगातार और बार-बार' हुईं, कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं था.

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SIT ने छह लोगों को प्राथमिक रूप से दोषी पाया, जिनमें अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडे और रामाशंकर मिश्रा शामिल हैं. अविनाश शुक्ला को मुख्य आरोपी (आरोपी नंबर 1) करार दिया गया. उसके पास से तलाशी में 20.39 लाख रुपए नकद, 1,121 अमेरिकी डॉलर, सोने-चांदी के गहने और एक SUV कार बरामद हुई. कुल मिलाकर आरोपियों से 79 लाख रुपए नकद, विदेशी मुद्रा और जेवरात बरामद किए गए. काउंटिंग रूम से सटे एक वॉशरूम से भी 2.25 लाख रुपए मिले.

सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि ये सभी छह आरोपी ट्रस्ट से जुड़े लोगों की सिफारिश पर नियुक्त किए गए थे. उनकी नियुक्ति SBI की आउटसोर्स एजेंसी सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज (SSS) के जरिए हुई, लेकिन ट्रस्ट के अधिकारियों की सिफारिश पर. SIT ने यह भी पाया कि मनीष कुमार यादव की सिफारिश उसके चाचा रामाशंकर यादव (उर्फ टिन्नू) ने की थी. टिन्नू चंपत राय के ड्राइवर थे और जिन पर दान प्रक्रिया पर काफी प्रभाव होने का आरोप है.

टिन्नू यादव को गिरफ्तार किया जा चुका है. उस पर 25 जून 2026 को राम जन्मभूमि पुलिस स्टेशन में कृष्ण मोहन की शिकायत पर FIR दर्ज की गई, जिसमें आठ लोगों को नामित किया गया. दिलचस्प बात यह है कि यह कृष्ण मोहन ही हैं जिन्हें अब अंतरिम महासचिव बनाया गया है.

क्यों नहीं रुकी चोरी?

SIT की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला प्रक्रियाओं की कमी का नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने में विफलता का था. ट्रस्ट और SBI के बीच सितंबर 2024 और फरवरी 2025 में मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) पर सहमति बनी थी. इसमें सख्त नियम थे- हुंडी सिर्फ अधिकृत ट्रस्ट और बैंक प्रतिनिधियों की मौजूदगी में खोली जाए, बायोमेट्रिक अटेंडेंस ली जाए, यूनिफॉर्म पहनाई जाए, काउंटिंग रूम में निजी सामान न ले जाया जाए, एंट्री और एग्जिट पर फ्रिस्किंग अनिवार्य हो, CCTV निगरानी हो.

SIT ने पाया कि इनमें से ज्यादातर सुरक्षा उपायों को या तो नजरअंदाज किया गया या खराब तरीके से लागू किया गया. फ्रिस्किंग नहीं होती थी, पॉकेटलेस यूनिफॉर्म लागू नहीं थी, निजी सामान अंदर जाने दिए जाते थे, बायोमेट्रिक अटेंडेंस काम नहीं करती थी, यानी चोरी के लिए पूरा माहौल तैयार था.

SIT ने अनील मिश्रा पर भी सवाल उठाए, जिन्होंने ट्रस्ट की तरफ से SOP बनाने में हिस्सा लिया था, लेकिन सुरक्षा उपायों को लागू करवाने में नाकाम रहे. रिपोर्ट में इसे 'गंभीर पर्यवेक्षी विफलता' करार दिया गया.

ट्रस्ट ने क्या फैसले लिए?

6 जुलाई 2026 की बैठक तीन घंटे (दोपहर 3:15 बजे से शाम 6:30 बजे तक) चली. इसमें 15 सदस्यीय ट्रस्ट के सात सदस्य व्यक्तिगत रूप से और दो वर्चुअल रूप से शामिल हुए. चंपत राय और अनील मिश्रा बैठक में नहीं आए:

  • इस्तीफा स्वीकार: चंपत राय और अनील मिश्रा ने 'नैतिक आधार' पर इस्तीफा दिया. राय ने कहा कि जांच पूरी होने तक महासचिव पद पर बने रहना उचित नहीं होगा. ट्रस्ट कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने कहा, 'राय और मिश्रा अब ट्रस्ट के सदस्य नहीं रहे.' उन्होंने यह भी बताया कि ट्रस्ट के वरिष्ठ ट्रस्टी के. पारासरन ने कहा था कि ट्रस्ट के संविधान के तहत इस्तीफा देते ही प्रभावी हो जाता है. ट्रस्ट के पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. ट्रस्ट ने गोपाल राव (गोपाल नागरकट्टे) को भी विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची से हटा दिया.ॉ
  • अंतरिम महासचिव: रिटायर्ड IFS अधिकारी और RSS सदस्य कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव नियुक्त किया गया. मोहन वही व्यक्ति हैं जिन्होंने दान चोरी मामले में FIR दर्ज कराई थी. 22 जुलाई 2026 की अगली बैठक में ट्रस्ट तय करेगा कि क्या मोहन को स्थायी महासचिव बनाया जाए.
  • CEO की नियुक्ति: ट्रस्ट ने पहली बार CEO पद बनाने का फैसला किया. इसके लिए तीन सदस्यीय सर्च कमेटी बनाई गई. इनमें रिटायर्ड जस्टिस प्रदीप कोहली, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल विष्णुकांत चतुर्वेदी और शिरडी साईं बाबा संस्थान के पूर्व अध्यक्ष सुरेश हवारे शामिल हैं. यह कमेटी उम्मीदवारों का इंटरव्यू लेकर ट्रस्ट को तीन नाम सुझाएगी, जिनमें से एक को ट्रस्ट चुनेगा.

ट्रस्ट ने कितना दान इकट्ठा किया?

ट्रस्ट कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने बताया कि 31 मार्च 2026 तक ट्रस्ट को श्रद्धालुओं से 582 करोड़ रुपए का दान मिला. इसमें से 319 करोड़ रुपए मंदिर के रखरखाव पर खर्च किए गए.

आखिर क्यों आई CEO की जरूरत?

राम मंदिर ट्रस्ट की संरचना भारत के दूसरे बड़े मंदिरों से बिल्कुल अलग है. तिरुपति, जगन्नाथ, वैष्णो देवी या काशी विश्वनाथ सभी का अपना कानून (स्टैच्यूट) है, जो राज्य विधानमंडल ने बनाया है. वहां CEO या EO (कार्यकारी अधिकारी) होता है, जो आमतौर पर IAS या PCS अधिकारी होता है और राज्य सरकार उसकी नियुक्ति करती है.

लेकिन राम मंदिर ट्रस्ट न तो निजी धार्मिक ट्रस्ट है, न ही कानून द्वारा स्थापित सांविधिक मंदिर बोर्ड. यह सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले, 1993 का अयोध्या अधिग्रहण अधिनियम, केंद्र सरकार की योजना और अधिसूचना, ट्रस्ट डीड के संयोजन से बना है. यानी यह न्यायिक आदेश के क्रियान्वयन में कार्यकारी कार्रवाई से अस्तित्व में आया सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट है.

CEO की नियुक्ति से दिन-प्रतिदिन का प्रशासन CEO संभालेगा और ट्रस्ट नीति-निर्धारण पर फोकस करेगा. यह मंदिर को तिरुपति, वैष्णो देवी जैसे बड़े मंदिरों की गवर्नेंस मॉडल के करीब लाता है.

RTI का सवाल: क्या ट्रस्ट आएगा दायरे में?

6 जून 2025 को केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने फैसला सुनाया कि ट्रस्ट 'सार्वजनिक प्राधिकरण' नहीं है और RTI के दायरे में नहीं आता. CIC ने यह फैसला गृह मंत्रालय के रुख के आधार पर लिया, जिसने ट्रस्ट से जुड़े दस्तावेजों को 'गोपनीय' बताया था. CIC के मुताबिक, ट्रस्ट 'न तो केंद्र सरकार के स्वामित्व में है, न ही नियंत्रित है और न ही वित्तपोषित.'

CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस रुख पर पुनर्विचार की मांग की है. उनका तर्क है कि ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार की योजना के तहत बना, गजट अधिसूचना से स्थापित हुआ और इसे संसद के कानून के तहत अधिग्रहीत भूमि हस्तांतरित की गई.' ट्रस्ट के शुरुआती 15 सदस्यों में से 12 को केंद्र ने नामित किया था. आज भी ट्रस्ट में केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के नामित IAS अधिकारी मौजूद हैं.

ब्रिटास ने सवाल उठाया, 'अगर ट्रस्ट पूरी तरह से निजी है, तो सरकार खुद उसके शासन में क्यों बैठी है?' उन्होंने वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड का उदाहरण दिया, जो RTI के दायरे में है.