उत्तराखंड में वर्ष 2027 में प्रस्तावित हरिद्वार अर्धकुंभ से पहले धार्मिक पहचान और प्रवेश को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है. साधु-संतों और कई हिंदू संगठनों की ओर से यह मांग उठाई जा रही है कि कुंभ मेले से पहले गंगा घाटों और मेला क्षेत्र के आसपास गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाई जाए. इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है और भाजपा विधायक विनोद चमोली का बड़ा बयान सामने आया है.

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भाजपा विधायक विनोद चमोली ने कहा कि संत समाज की भावनाओं और मांगों को सरकार गंभीरता से ले रही है. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी समुदाय के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित करना व्यावहारिक और कानूनी रूप से एक चुनौतीपूर्ण विषय है. उनका कहना है कि सरकार सभी पहलुओं पर मंथन कर रही है और ऐसा समाधान निकाला जाएगा, जिससे परंपरा, आस्था और कानून के बीच संतुलन बना रहे.

हरिद्वार की धार्मिक पहचान को समझना जरुरी  

विनोद चमोली ने हरिद्वार की ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए कहा कि इस नगरी की मूल संरचना को समझना बेहद जरूरी है. उन्होंने दावा किया कि अंग्रेजी शासनकाल में हरिद्वार को विशेष रूप से हिंदुओं के धार्मिक कार्यों, पूजा-पाठ और तीर्थ गतिविधियों के लिए विकसित किया गया था, जबकि अन्य समुदायों के लिए ज्वालापुर क्षेत्र को अलग रूप से बसाया गया. चमोली के अनुसार यह विभाजन हरिद्वार की धार्मिक गरिमा और परंपराओं को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से किया गया था.

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सनातन की राजधानी है हरिद्वार

भाजपा विधायक ने हरिद्वार को सनातन धर्म की राजधानी बताते हुए कहा कि यह नगरी मूल रूप से धार्मिक अनुष्ठानों, गंगा स्नान और आध्यात्मिक साधना के लिए स्थापित की गई है. उन्होंने कहा कि अर्धकुंभ जैसे भव्य धार्मिक आयोजन से पहले हरिद्वार की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को बनाए रखना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है.

इस पूरे विवाद के बीच विपक्ष ने भी सरकार पर सवाल खड़े किए हैं, जबकि संत समाज अपनी मांगों पर अडिग नजर आ रहा है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या ठोस निर्णय लेती है.