अयोध्या में धर्म ध्वजा के साथ ही भगवान राम के विवाह की धूम पूरे अयोध्या में दिखाई दे रही है. मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की मुख्य बारात तो जनकपुर जाती है, जिसमे साधु संत और अयोध्यावासी होते हैं, लेकिन अयोध्या में भी श्री राम बारात एक मंदिर से दूसरे मंदिर में जाती है. चूंकि जनकपुर के बजाय राम बारात रसिक सम्प्रदाय के मंदिरों में जाती है. जहां उनका स्वागत और आशीर्वाद दिया जाता है.

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प्रभु श्रीम की नगरी में अध्यात्म का यह उत्साह श्रद्धालुओं में कुछ अलग ही रंग भरता है. दास प्रथा के सभी साधू संत भगवान राम को ही अपना सबकुछ मानते हैं.

रसिक संप्रदाय माता सीता को देते हैं प्रमुखता

रसिक संप्रदाय से जुड़े साधु संत सीता को प्रमुखता देते हैं. और खास तौर पर माता पिता की आराधना करते हैं और यह सभी साधु-संत अपने नाम के आगे शरण लगाते हैं, जबकि अपने नाम के आगे दास लगाने वाले साधु संत प्रभु श्री राम को ही अपना सब कुछ मानते हैं और माता सीता की आराधना उनकी धर्मपत्नी होने के नाते करते हैं.

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सम्पूर्ण विवाह की निभाई जाती हैं रस्में

बारात निकालते और उसमें शामिल होते दास संप्रदाय के साधु संत के मंदिरों से श्री राम की बारात निकलती है, और वह सभी लोग उस बारात में शामिल होते हैं. दास संप्रदाय के साधु संत के मंदिरों में प्रभु राम की बारात जाती है और सीता पक्ष यानि रसिक संप्रदाय के उन लोगों के मंदिरों में जो अपने नाम के आगे शरण लगाते हैं. बारात पहुंचने पर वर पक्ष और कन्या पक्ष के बीच वह सभी रस्म निभाई जाती है जो सामान्यतः किसी विवाह समारोह में होती है, और पूरे विधि विधान के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और माता सीता की शादी संपन्न होती है.

अयोध्या की इस परम्परा को देखने के लिए न सिर्फ इन दोनों सम्प्रदायों बल्कि बड़ी संख्या में स्थानीय और राम के दर्शन करने वाले श्रद्धालू भी शामिल होते हैं. ये उनके लिए अध्यात्म अक एक अलग अनुभव है. जिसमें शामिल होकर अपने आराध्य का साक्षात्कार करते हैं.