यूपी में पंचायत चुनाव को लेकर होने वाली देरी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कड़ी नाराजगी जताई है. कोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार से सवाल किया कि पंचायत चुनाव की संभावित तारीख बताइए. इसके साथ ही कोर्ट ने ग्राम प्रधानों का कार्यकाल छह महीने बढ़ाने और प्रशासक नियुक्त करने के फैसले पर भी सवाल उठाए और सरकार की दलीलों पर असंतुष्टि जताई. 

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प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के मामले में जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने बुधवार को ओमप्रकाश प्रजापति की याचिका पर सुनवाई की. कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश देते हुए कहा कि 10 जुलाई को पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट पेश करिए.  इस मामले पर अगली सुनवाई 10 जुलाई को होगी. 

पंचायत चुनाव को लेकर हाईकोर्ट सख्त

पंचायत चुनाव में सीटों के आरक्षण के निर्धारण के लिए सरकार ने समर्थित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया है, जो छह माह में अपनी रिपोर्ट देगा. इसकी रिपोर्ट के बाद ही पंचायत चुनाव कराने की बात कही जा रही थी. लेकिन, अब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार को ओबीसी आयोग रिपोर्ट पेश किया.

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जानकारी के अनुसार पंचायत चुनाव में सीटों के आरक्षण के निर्धारण के लिए सरकार ने समर्थित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया है. जो छह माह में अपनी रिपोर्ट देगा. इसकी रिपोर्ट के बाद ही पंचायत चुनाव कराने की बात कही जा रही थी. लेकिन, अब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार को ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पेश करनी है. साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग को भी पंचायत चुनाव की तिथि भी कोर्ट को बतानी होगी.

याची ने क्या कहा है जानिए

याची ओमप्रकाश प्रजापति ने कहा, उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12 ,3,(क) के अनुसार ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तिथि से अधिकतम पांच साल का होता है. लेकिन, समय पर पंचायत चुनाव नहीं कराकर मौजूदा प्रधानों को प्रशासक बना दिया गया. यह उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने जैसा, जो कानून के खिलाफ है.

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि पहले जब पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते थे तब ग्राम पंचायतों के संचालन के लिए एडीओ पंचायत अथवा अन्य सक्षम अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था. इसलिए इस बार भी किसी सरकारी अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए थी. 

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ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर सवाल

25 मई को राज्य सरकार ने आदेश जारी कर पंचायत चुनाव संपन्न होने अथवा अगले छह माह तक मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया. इसी फैसले को चुनौती देते हुए दाखिल जनहित याचिका पर अब हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है. याचिकाकर्ता ने कहा कि इस बार भी किसी सरकारी अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए थी.

प्रधानों को प्रशासक बनाने की स्थिति क्यों बनी ये भी बड़ा सवाल है. इस पर जो बात सामने है उसके अनुसार पंचायत चुनाव की वोटर लिस्ट का अंतिम प्रकाशन अभी तक नहीं हुआ है. ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई तक था जबकि, लिस्ट का अंतिम प्रकाशन 10 जून को होगा. पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए ओबीसी आयोग बनाने का प्रस्ताव कैबिनेट से मंजूर हो चुका है. आयोग बनने के 3 से 6 महीने के अंदर रिपोर्ट पेश करेगा.

ओम प्रकाश राजभर ने सपा पर साधा निशाना

यूपी के पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने इसे लेकर सपा पर निशाना साधा और कहा कि हर अच्छे काम में अड़ंगा लगाना सपा की पुरानी आदत है. गांवों में चल रहे विकास कार्यों को प्रभावित करने के लिए सपा पूरे पंचायत तंत्र को अदालती उलझनों में फंसाने की कोशिश में जुटी है. 

राजभर ने कहा योगी सरकार ने ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने के लिए प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया. प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने पर सपाइयों के पेट में तेज दर्द उठने लगा. क्या समाजवादी पार्टी इस फैसले को भी अदालतों और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझाकर ग्राम प्रधानों को मिलने वाले अधिकारों को निष्प्रभावी करने का का पुरजोर तरीके से प्रयास कर रही है?

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