राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर जिले के ऋषभदेव थाना क्षेत्र में दर्ज कथित जबरन धर्मांतरण (Forced Religious Conversion) के मामले में गिरफ्तार 13 आरोपियों को बड़ा झटका दिया है. कोर्ट ने इन सभी आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं.

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न्यायमूर्ति सुनील बेनीवाल की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इस केस की जांच अभी जारी है और केस डायरी देखने से आरोपियों की प्रथम दृष्टया (Prima Facie) संलिप्तता नजर आती है. ऐसे में जांच के इस स्तर पर उन्हें जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता.

क्या है पूरा मामला और किन धाराओं में दर्ज है FIR?

कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार, यह मामला 6 जून 2026 को दर्ज एफआईआर (FIR) संख्या 159/2026 से जुड़ा है. आरोपियों पर सख्त धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299, 302 और 196(1)(a) राजस्थान गैरकानूनी धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2025 की संबंधित धाराएं.

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बचाव पक्ष और सरकार की दलीलें

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से जोरदार बहस हुई. आरोपियों के वकीलों ने दलील दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया है. यह केवल एक धार्मिक सभा थी और किसी का जबरन धर्मांतरण नहीं कराया गया. शिविर से कोई आपत्तिजनक सामग्री भी नहीं मिली है और आरोपी लंबे समय से जेल में हैं.

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जमानत का कड़ा विरोध किया. उन्होंने बताया कि कुछ आरोपी छत्तीसगढ़ से इस शिविर में पहुंचे थे. स्थानीय आरोपियों ने लोगों को बुलाने और धर्मांतरण गतिविधियों में पूरा सहयोग किया. जांच में मोबाइल चैट, आपसी संपर्क और वित्तीय लेनदेन (Financial Transactions) के अहम सुराग मिले हैं.

कोर्ट ने जमानत खारिज करते हुए क्या कहा?

हाईकोर्ट ने केस डायरी का बारीकी से अवलोकन करने के बाद माना कि आरोपियों की भूमिका संदिग्ध है. कोर्ट ने जमानत खारिज करते हुए निम्नलिखित बिंदु रखे. मामले की जांच अभी पूरी नहीं हुई है और अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी होना बाकी है. इस स्तर पर आरोपियों को जमानत देने से साक्ष्यों (Evidence) के साथ छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा चालान (Chargesheet) पेश किए जाने के बाद आरोपी नई जमानत याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र होंगे.

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