राजस्थान में जल्द होने वाले नगर निकायों और ग्राम पंचायतों के चुनाव में महिलाओं को घूंघट और बुर्के में मतदान करने से रोकने के फैसले पर अब सियासत शुरू हो गई है. कांग्रेस का आरोप है कि राज्य निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन की आड़ में बुर्का पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं को टारगेट किया जा रहा है.
वहीं, बीजेपी इस गाइडलाइन के समर्थन में है. इस मामले को लेकर कोहराम इसलिए भी मचा हुआ है, क्योंकि राजस्थान में निकाय और पंचायत के चुनाव में महिलाओं की ड्यूटी नहीं लगती है. हालांकि राजस्थान सरकार की दलील है कि मतदान कर्मी घूंघट और बुर्के वाली महिलाओं की पहचान के लिए स्थानीय महिलाओं की मदद ले सकते है.
बहरहाल, इस पूरे विवाद में घूंघट कहीं पीछे छूट गया है और बहस सिर्फ बुर्के को लेकर ही हो रही है. जिस वजह से सरकार और विपक्ष आमने- सामने आ गए हैं. चुनाव के तारीखों के ऐलान से पहले स्थानीय निकाय के चुनाव विवादों ने हर घर में अपनी जगह बना ली है. कहा जा रहा है कि बिहार के बाद बुर्का अब राजस्थान के सियासी गलियारों में तूफान मचा रहा है.
घूंघट या बुर्का हटाकर ही वोट डालने का मिलेगा मौका
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक राजस्थान में नगरीय निकाय और ग्राम पंचायत के चुनाव 15 अप्रैल तक हो जाएंगे. चुनाव से हफ्ते भर पहले राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी गाइडलाइन जारी कर दी है. गाइडलाइन में कहा गया है कि चुनाव में महिला कर्मचारियों की ड्यूटी नहीं लगाई जाएगी. यह भी कहा गया है कि पर्दानशी महिलाओं को पहचान साबित किए बिना उन्हें वोट डालने की इजाजत भी नहीं दी जाएगी. उन्हें चेहरे से घूंघट या बुर्का हटाकर अपनी पहचान साबित करनी होगी, इसके बाद ही उन्हें वोट डालने का मौका दिया जाएगा.
गाइडलाइन के मुताबिक महिला कर्मचारियों की ड्यूटी नहीं लगाई जाएगी, लेकिन पर्दानशी महिलाओं की पहचान चेक करने के लिए पोलिंग ऑफिसर यानी पीठासीन अधिकारी स्थानीय आंगनबाड़ी वर्कर, हेल्थ वर्कर, टीचर या फिर पंचायत सदस्य जैसी किसी भी महिला की मदद ले सकते हैं.
सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की नीयत ठीक नहीं- पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास
यह गाइडलाइन सामने आने के बाद अब इस पर सियासत भी शुरू हो गई है. कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास का साफ तौर पर आरोप है कि एक तरफ तो महिला कर्मचारियों की ड्यूटी नहीं लगाई जा रही है और दूसरी तरफ घूंघट और बुर्के में रहने वाली महिलाओं को पहचान साबित करने के लिए कहा जा रहा है.
पूर्व मंत्री खाचरियावास ने कहा कि इस गाइडलाइन के नाम पर बुर्का पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं को टारगेट किया जाएगा और उन्हें वोट डालने से रोका जाएगा, इसलिए पहले से ही इस बारे में विवाद और प्रोपोगेंडा खड़ा कर मुस्लिम महिलाओं को डराने का काम किया जा रहा है. खाचरियावास के मुताबिक सर और चेहरे को ढक कर रखना भारतीय परंपरा में है.
ऐसे में किसी विशेष पर शक होने पर पोलिंग कर्मी उससे पहचान पत्र तो मांग सकते हैं, लेकिन सभी महिलाओं के लिए चेहरा खोलकर पुरुषों को दिखाने का फरमान बिल्कुल उचित नहीं है. उनके मुताबिक इस मुद्दे को लेकर सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की नीयत ठीक नहीं लग रही है.
बीजेपी सरकार का कांग्रेस पर बेवजह सियासत करने का आरोप
बीजेपी के नेता और प्रदेश मंत्री मुकेश पारीक ने राज्य निर्वाचन आयोग के इस फैसले पर न सिर्फ अपनी सहमति जताई है, बल्कि खुलकर इसका समर्थन भी किया है. उन्होंने कहा है कि सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पहनने की परंपरा ही गलत है, इस रिवाज को खत्म कर देना चाहिए. स्वायत्त शासन विभाग के कैबिनेट मंत्री झाबर सिंह खर्रा को भी इस गाइडलाइन में कुछ भी गलत नजर नहीं आ रहा है.
उनका कहना है कि स्थानीय निकाय के चुनाव में महिला कर्मचारियों की ड्यूटी नहीं लगती है, लेकिन पीठासीन अधिकारी स्थानीय महिलाओं की मदद ले लेते हैं. बीजेपी सरकार ने कांग्रेस पर बेवजह की सियासत करने का गंभीर आरोप लगाया है.
नीतीश कुमार के बाद बुर्का फिर से सियासत का केंद्र
बहरहाल चुनाव से पहले राज्य निर्वाचन आयोग की यह गाइडलाइन सवालों के घेरे में है. इस बारे में आयोग का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है. पहले भी प्रत्येक मतदाता से पहचान साबित करने की अपेक्षा की जाती रही है. चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए. कहा जा रहा है कि घूंघट और बुर्के का यह विवाद चुनाव के समय और भी तूल पकड़ सकता है.
वहीं, इस मुद्दे को लेकर हो रही सियासत में तुष्टिकरण और भेदभाव के आरोप भी लग रहे हैं. नीतीश कुमार एपिसोड के बाद चुनाव गाइडलाइन के बहाने बुर्का एक बार फिर से सियासत का केंद्र बिंदु बना हुआ है.