अंता विधानसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार की करारी हार ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है. जिस प्रदेश में भाजपा की सरकार है, उसी प्रदेश में भाजपा प्रत्याशी की इतनी बड़ी हार ने सत्ता और संगठन दोनों के सामने कई तल्ख सवाल खड़े कर दिए हैं. कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद जैन भाया 15,612 मतों से जीते है. जिससे साफ संदेश दे दिया है कि भाजपा के खिलाफ प्रदेश जनता की नाराजगी गहराती जा रही है.

Continues below advertisement

अंता की हार ने सिरोही जिले में भी राजनीतिक समीकरण बदल सकती है. खासकर पिण्डवाड़ा क्षेत्र में मेसर्स कमलेश मेटा कास्ट की प्रस्तावित खनन परियोजना ने भाजपा नेतृत्व की नींदें उड़ा दी हैं. इस विवाद ने अब पूरे जिले में आग की तरह फैलकर बड़ा जनआंदोलन खड़ा कर दिया है. ग्रामीणों का आक्रोश लगातार बढ़ रहा है और भाजपा नेताओं का इलाके में विरोध तेज हो चुका है.

आबू–पिण्डवाड़ा: भाजपा का गढ़ हिलने की कगार पर

आबू–पिण्डवाड़ा सीट को वर्षों से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. लेकिन खनन परियोजना पर सरकार की चुप्पी और स्थानीय नेतृत्व की उदासीनता ने लोगों में गहरा असंतोष पैदा कर दिया है. ग्रामीणों का आरोप है कि जनभावनाओं के खिलाफ जाकर खनन परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे पर्यावरण, जलस्रोत और आजीविका पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है. यह नाराजगी अब केवल गांवों में सीमित नहीं रही, बल्कि प्रदेश स्तर तक गूंज चुकी है.

Continues below advertisement

जनता की नाराजगी बढ़ी—'सुना रही खरी-खरी'

स्थानीय भाजपा नेताओं की गांवों में स्थिति खराब बताई जा रही है. लोग खुलकर कह रहे हैं कि- उनके मुद्दों को नजरअंदाज किया गया. खनन परियोजना जबरन थोपने का प्रयास हुआ. जनप्रतिनिधि अहंकार में चूर होकर जनता से दूर हो गए है. ग्रामीणों का आक्रोश अब चरम पर पहुंच चुका है. कई जगहों पर बैठकें, विरोध और आगामी संघर्ष की रणनीतियाँ बन रही हैं.

भजनलाल सरकार के लिए बड़ा संकेत—अंता से पिण्डवाड़ा तक जनता खफा क्यों..?

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने 15 दिसंबर 2023 को पदभार संभाला था.लेकिन दो साल के भीतर ही जनता में निराशा गहराने लगी है. अंता उपचुनाव के नतीजे और सिरोही का माहौल यह संदेश दे रहे हैं कि ग्रामीण मुद्दों को दरकिनार किया गया है.

जरूरी मंथन- वरना बढ़ सकता है नुकसान

राजस्थान में सत्ता में होने के बावजूद उपचुनाव में हार और पिण्डवाड़ा में बढ़ते आंदोलन ने भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. यदि समय रहते—अहंकार नहीं छोड़ा,

जनता की बात नहीं सुनी तो आगामी चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.

दिल्ली में बैठे शीर्ष नेतृत्व को अब मंथन करना ही होगा कि आखिर जनभावनाओं के विरुद्ध जाकर लिए गए निर्णय भाजपा की जड़ों को कमजोर क्यों कर रहे हैं.