राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास में 11 साल पहले हुए दलितों के सामूहिक हत्याकांड का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है. इस मामले में कोर्ट द्वारा सभी 40 आरोपियों को बरी किए जाने के बाद दलित संगठनों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है. बुधवार (12 अगस्त) को राजधानी जयपुर के शहीद स्मारक पर बड़ी संख्या में दलित संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पीड़ित परिवार के सदस्यों ने धरना दिया और न्याय की गुहार लगाई.

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धरने को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कोर्ट के फैसले पर गहरी निराशा और हैरानी जताई. प्रदर्शनकारियों का सबसे बड़ा सवाल यही था कि 2015 में हुए जमीन विवाद में 5 दलितों समेत 6 लोगों की बेरहमी से जान गई थी. मामले की जांच 11 साल तक चली और सीबीआई (CBI) ने 40 लोगों को आरोपी बनाकर चार्जशीट पेश की. इसके बावजूद सभी आरोपी कैसे बरी हो गए? उन्होंने कहा कि अगर हत्याएं हुई हैं, तो कोई न कोई तो जिम्मेदार होगा; फिर उसे सजा क्यों नहीं मिल रही?

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न्याय व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

धरने में मौजूद दलित चिंतकों ने कहा कि यह फैसला सिर्फ एक मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि यह दलितों के न्याय पाने के अधिकार पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है. इस तरह के फैसलों से कमजोर और वंचित समाज का देश की न्याय व्यवस्था पर से भरोसा टूटता है.

सरकार को चेतावनी: हाईकोर्ट में करें अपील

प्रदर्शन कर रहे दलित संगठनों ने राज्य सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस मामले में हाईकोर्ट में मजबूती से अपील नहीं की गई, तो इस आंदोलन को और उग्र किया जाएगा. उन्होंने साफ कहा कि वे इस मुद्दे को यहीं दबने नहीं देंगे और जब तक पीड़ितों को न्याय नहीं मिल जाता, उनका संघर्ष जारी रहेगा.

क्या है पूरा डांगावास प्रकरण?

गौरतलब है कि 14 मई 2015 को नागौर के डांगावास गांव में करीब 23 बीघा जमीन के विवाद को लेकर दो पक्षों में खूनी संघर्ष हुआ था. इस भीषण हिंसा में पांच दलितों सहित छह लोगों की मौत हो गई थी. घटना की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीआई को सौंपी गई थी. सीबीआई ने 40 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन हाल ही में 5 अगस्त 2026 को मेड़ता की एससी-एसटी विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया.

सियासत भी हुई तेज

इस फैसले के बाद राजस्थान की राजनीति में भी बयानबाजी तेज हो गई है. दलित संगठनों के अलावा कांग्रेस भी इस मुद्दे पर मुखर है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने इस फैसले पर सवाल खड़े करते हुए न्याय की मांग की है.

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