अपने जमाने के दिग्गज फिल्मी कलाकार और पूर्व सांसद धर्मेंद्र के निधन से राजस्थान के बीकानेर में भी मातम का माहौल है. धर्मेंद्र 21 साल पहले साल 2004 में बीकानेर से ही सांसद चुने गए थे. उन्होंने उस वक्त के कांग्रेस के दिग्गज नेता रामेश्वर डूडी को करीब 57 हज़ार वोटो से हराया था. बीकानेर के सांसद के तौर पर धर्मेंद्र का पांच साल का कार्यकाल खट्टे मीठे अनुभव वाला रहा था. इसके बाद उन्होंने राजनीति से तौबा भी कर ली थी.
धर्मेंद्र ने अपने संसदीय क्षेत्र बीकानेर में विकास के कई बड़े काम कराए. हालांकि इनमें से ज्यादातर काम का क्रेडिट मंझे हुए राजनेता अपने पाले में ले गए थे. इन्हीं में एक बड़ा काम था बीकानेर के सूरसागर तालाब का जीर्णोद्धार. कभी सुसाइड पॉइंट के तौर पर बदनाम सूरसागर तालाब को धर्मेंद्र ने राजस्थान और केंद्र की सरकार के सहयोग से पिकनिक स्पॉट के तौर पर विकसित करा दिया था. हालांकि इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर राजस्थान की तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार गिनाती थी.
क्रेडिट न मिलने पर जताया था मलाल
धर्मेंद्र को इसका मलाल भी था. धर्मेंद्र ने बीकानेर में हुए एक सार्वजनिक समारोह में कहा था कि यहां काम वह करते हैं और उसका क्रेडिट कोई और ले जाता है. राजनीति शायद इसी का नाम है और वह इसके लिए कतई फिट नहीं है. कामों के क्रेडिट को लेकर ही धर्मेंद्र ने बीकानेर में राजनीति से दूरी बनाने का ऐलान किया था. उन्होंने यहां कहा था कि राजनीति के दांव पेंच उनकी समझ के बाहर हैं.
लापता पोस्टर के बाद कई दिन रुके थे
सांसद चुने जाने के कुछ दिन बाद ही उन्हें यह समझ आया कि वह सियासत में बहुत दिनों तक टिक नहीं पाएंगे। यही वजह है कि उन्होंने धीरे-धीरे बीकानेर से दूरी बनानी शुरू कर दी थी. बीच में उनके लापता होने के पोस्टर लगे तो धर्मेंद्र कई दिनों तक सर्किट हाउस में रुके रहे और सुरक्षा घेरे को नजरअंदाज कर लोगों की समस्याएं सुनते रहे. कई लोगों की नाराजगी तो उन्होंने शोले फिल्म के डायलॉग सुना कर दूर कर दी थी.
अपने एक प्रशंसक के अनुरोध पर वह उसके फोटो कलर लैब का उद्घाटन करने के लिए भी पहुंचे थे. यह प्रशंसक धर्मेंद्र से इतना प्रभावित हुआ कि उसने कलर लैब को उन्हीं के नाम पर कर दिया.
शुरुआत में बीजेपी नेताओं ने नहीं दिया था साथ
धर्मेंद्र जब चुनाव लड़ने के लिए बीकानेर आए थे तो उनकी अपनी पार्टी बीजेपी के तमाम नेता और कार्यकर्ता काफी दिनों तक नाराज थे और खुलकर प्रचार नहीं कर रहे थे. उनका मानना था कि धर्मेंद्र बाहरी हैं और उनके आने से उनकी खुद की सियासत प्रभावित होगी. धर्मेंद्र ने गांव-गांव, गली गली घूम कर नुक्कड़ सभाओं के जरिए लोगों को शोले फिल्म के डायलॉग सुना कर उन्हें प्रभावित किया था. लोगों को भरोसा दिलाया था कि जिस तरह की लड़ाई उन्होंने फिल्म शोले में गब्बर के खिलाफ लड़ी थी. जैसे उन्होंने रामगढ़ के लोगों की मदद की थी, उसी तरह से वह बीकानेर के लोगों की मदद के लिए भी हमेशा मौजूद रहेंगे.
हालांकि सांसद के तौर पर वह बहुत ज्यादा लोकप्रिय तो नहीं हुए, लेकिन बीकानेर के लोगों के दिलों में वह आज भी बसे हुए हैं. आज जब उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया तो बीकानेर के तमाम लोग दुखी हैं और उन्हें याद कर रहे हैं. वह जब भी बीकानेर आते थे तो फिल्मी दुनिया के स्टारडम को मुंबई में ही छोड़ देते थे.