पंजाब के जालंधर जिले से दुखद खबर सामने आई है. दुनियाभर में अपने अद्भुत मैराथन रिकॉर्ड्स के लिए मशहूर रहे 114 वर्षीय एथलीट फौजा सिंह का सोमवार को निधन हो गया. वह सैर के लिए अपने घर से निकले थे, तभी दोपहर करीब 3 बजे एक अज्ञात वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी. हादसे के बाद उन्हें गंभीर हालत में एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान रात को उन्होंने अंतिम सांस ली.

घटना की सूचना मिलते ही थाना आदमपुर की पुलिस मौके पर पहुंची. एसएचओ हरदेव सिंह ने बताया कि फौजा सिंह के बेटे द्वारा दी गई सूचना के बाद एफआईआर दर्ज कर ली गई है. वाहन की पहचान अभी नहीं हो सकी है, लेकिन पुलिस टीमें सीसीटीवी और अन्य सुरागों के ज़रिए जांच कर रही हैं. उन्होंने आश्वासन दिया कि आरोपी को जल्द गिरफ्तार किया जाएगा.

1911 में जन्मे फौजा सिंह बने थे बुजुर्गों के प्रेरणा स्रोत

फौजा सिंह का जन्म 1911 में पंजाब के जालंधर जिले के ब्यास गांव में हुआ था. उन्होंने 90 वर्ष की उम्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैराथन दौड़ना शुरू किया और तब से लेकर 100 साल की उम्र तक कई कीर्तिमान स्थापित किए. उन्हें ‘टर्बन टॉरनेडो’ यानी ‘पगड़ीधारी तूफान’ कहा जाता था. उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि उम्र सिर्फ एक संख्या है.

व्यक्तिगत दुखों ने दी नई ऊर्जा

अपने जीवन में फौजा सिंह ने कई दुख झेले, जिनमें 1992 में पत्नी और बेटी की मौत, और 1994 में बेटे की दुर्घटना में मृत्यु शामिल हैं. इन घटनाओं ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया, लेकिन उन्होंने 1995 में खुद को फिर से खड़ा किया और दौड़ को जीवन का उद्देश्य बना लिया.

दुनिया के कई रिकॉर्ड किए अपने नाम

उन्होंने पहली मैराथन 2000 में लंदन में पूरी की और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. 2004 में 93 साल की उम्र में उन्होंने लंदन मैराथन 6 घंटे 54 मिनट में पूरी की, जो उस उम्र में एक अद्भुत रिकॉर्ड था. 2011 में टोरंटो में उन्होंने 100 वर्ष की उम्र में मैराथन पूरी कर इतिहास रच दिया और उसी दौरान एक ही दिन में आठ वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाए.

चैरिटी और विज्ञापन की दुनिया में भी कायम की पहचान

फौजा सिंह ने एडिडास के एक विज्ञापन में डेविड बेकहम और मोहम्मद अली जैसे दिग्गजों के साथ हिस्सा लिया. 2011 में उनकी जीवनी "टर्बन्ड टॉरनेडो" ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में लॉन्च हुई. उन्होंने पीईटीए और ब्रांड लॉरेट जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी भागीदारी की और बुजुर्गों के लिए एक मिसाल बने.

102 वर्ष की उम्र में उन्होंने प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ों से संन्यास लिया, लेकिन स्वास्थ्य और समाज सेवा के लिए दौड़ते रहे. उनकी फिटनेस, अनुशासन और जीवन के प्रति सकारात्मक सोच आज भी सभी उम्र के लोगों को प्रेरित करती है.

उनका जीवन संघर्ष, प्रेरणा और उपलब्धियों से भरा रहा. उनका निधन खेल जगत और मानवता दोनों के लिए एक बड़ी क्षति है. देश ने एक ऐसे व्यक्ति को खोया है, जिसने यह दिखा दिया कि हौसले हों तो उम्र कोई बाधा नहीं.