1 फरवरी को पेश किए गए केंद्रीय बजट पर शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र सामना में कटाक्ष करते हुए संपादकीय लिखा है. लेख में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में प्रस्तुत बजट को मायावी और निराशाजनक बताया गया है. शिवसेना यूबीटी का कहना है कि यह बजट वर्तमान की समस्याओं को नजरअंदाज कर 2047 के सपनों में उलझा हुआ है.
संपादकीय में कहा गया है कि वित्त मंत्री ने अपने 85 मिनट के भाषण में वित्तीय घाटा, राजकोषीय घाटा और कर संग्रह जैसे बड़े आंकड़े गिनाए, जिन पर सत्ता पक्ष ने तालियां बजाईं. लेकिन गरीब, किसान, मेहनतकश और मध्यमवर्ग के लिए कोई ठोस राहत नहीं दिखी. बजट की निराशा का अंदाजा इससे लगाया गया कि भाषण के पांच मिनट के भीतर ही शेयर बाजार 2400 अंकों तक गिर गया. बीएसई और निफ्टी में भारी गिरावट के साथ निवेशकों के करीब 16 लाख करोड़ रुपये डूब गए. लेख में ये भी सवाल उठाए गए कि अब उसकी भरपाई के लिए क्या 20 साल इंतजार करना होगा?
कर नीति, मध्यमवर्ग और किसानों की अनदेखी
सामना ने लिखा कि ऑप्शन ट्रेडिंग पर नया कर और फ्यूचर्स पर सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स बढ़ाने से निवेशकों में घबराहट फैल गई. हाल के वर्षों में शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाला मध्यमवर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुआ. आयकर में राहत की उम्मीद लगाए नौकरीपेशा वर्ग को भी निराशा हाथ लगी.
वहीं, कृषि प्रधान देश होने के दावों के बावजूद किसानों को लागत आधारित उचित मूल्य देने पर बजट में चुप्पी साध ली गई. किसानों की आय दोगुनी करने का वादा अधूरा रह गया, जबकि खेती की लागत कई गुना बढ़ चुकी है. उन्होंने लिखा- किसानों की आय दोगनी तो नहीं हुई, लेकिन खेती की लागत जरूर दोगुने से ज्यादा बढ़ गई. घाटे में जा रही खेती को मुनाफे में लाने के लिए इस बजट में कोई ठोस प्रावधान नजर नहीं आता.
फाइनेंस मिनिस्टर ने कहा कि उत्पादकता बढ़ाकर आर्थिक विकास की गति तेज करना, लोगों की क्षमताओं को पहचानकर देश की प्रगति में जनता को शामिल करना और देश के हर परिवार व हर क्षेत्र तक संसाधन और अवसर पहुंचाना ये इस बजट के तीन मुख्य उद्देश्य हैं. लेकिन भाषण के ये मुद्दे कभी जमीन पर उतरते नहीं दिखते हैं.
'बीस साल बाद' एक थ्रिलर फिल्म!
लेख में माना गया है कि हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, आयुर्वेदिक एम्स, छात्रावास और कुछ दवाओं को सस्ता करने जैसी घोषणाएं सकारात्मक हैं, लेकिन कुल मिलाकर बजट खोखले आनंद जैसा है. स्मार्ट सिटी योजना की विफलता के बावजूद नए शहरों के लिए भारी राशि की घोषणा पर सवाल उठाए गए हैं. सामना ने रुपये की गिरती कीमत और बढ़ते कर्ज का जिक्र करते हुए सरकार के विकास दावों पर भी संदेह जताया. संपादकीय के मुताबिक 2047 का विकसित भारत दिखाने वाला यह बजट ‘बीस साल बाद’ फिल्म की तरह एक थ्रिलर है, जिसमें जनता को नुकसान और जवाब अधूरा ही नजर आता है.