शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे के बीच राजनीतिक युति की बुधवार (24 दिसंबर) आखिरकार आधिकारिक घोषणा हो गई. कई वर्षों से अलग-अलग राह पर चल रहे उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे अब महाराष्ट्र के हित और मराठी मानुष के न्यायोचित अधिकारों के लिए एकजुट हुए हैं.

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इस दौरान अपने संबोधन में उद्धव ठाकरे ने कहा, "हमारे बीच इतनी सहमति बन चुकी है. हमारा गठबंधन सिर्फ बीएमसी चुनाव को लेकर नहीं हुआ है. आज मैं आप सभी का स्वागत करता हूं. संजय राउत ने संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की याद दिलाई. जो मंगल कलश लाया गया, वह किसी सत्यनारायण पूजा की तरह नहीं लाया गया था, बल्कि उसके पीछे बहुत बड़ा संघर्ष था. 105, 107 या उससे भी अधिक मराठी लोगों ने बलिदान देकर मुंबई को महाराष्ट्र का हिस्सा बनाया. आज उसकी याद आना स्वाभाविक है, क्योंकि आज हम दोनों यहां बैठे हैं ठाकरे भाई."

कैसे हुई थी शिवसेना की स्थापना?

उन्होंने आगे कहा, "हम दोनों के दादा प्रबोधनकार संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के पहले पांच सेनापतियों में से एक थे. उनके साथ मेरे पिता, शिवसेनाप्रमुख हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे और राज के पिता, मेरे काका श्रीकांत ठाकरे पूरा ठाकरे परिवार उस समय मुंबई के लिए संघर्ष कर रहा था. उसके बाद का इतिहास मैं विस्तार से नहीं बताऊंगा. लेकिन मुंबई महाराष्ट्र को मिलने के बाद भी मुंबई में मराठी मानुस के सीने पर चढ़कर नाचने की कोशिशें शुरू हुईं. तब न्याय और अधिकारों के लिए शिवसेनाप्रमुख को शिवसेना की स्थापना करनी पड़ी."

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उद्धव ठाकरे ने कहा, "अगले साल शिवसेना को 60 साल पूरे होंगे. इतने वर्षों तक सब ठीक चला, लेकिन आज फिर हम देख रहे हैं कि मुंबई को नोचने-तोड़ने और उसके टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा रखने वाले जिन्हें तब भी मुंबई चाहिए थी आज उनके प्रतिनिधि दिल्ली में बैठे हैं. अगर हम आपस में लड़ते रहे, तो जो संघर्ष हुआ और जो शहीदों का स्मारक है, उसका बड़ा अपमान होगा."

'आपस में बिखरें नहीं, टूटें नहीं'

उद्धव ठाकरे ने कहा, "उत्साह अपार है. आपके माध्यम से मैं पूरे महाराष्ट्र से निवेदन, आह्वान और एक चेतावनी दे रहा हूं. विधानसभा चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी ने 'बटेंगे तो कटेंगे' जैसा दुष्प्रचार किया था. आज मैं मराठी मानुस से कहता हूं अब अगर चूक हुई तो सब समाप्त हो जाएगा, अगर बिखरे तो पूरी तरह खत्म हो जाएंगे. इसलिए एक बार फिर न टूटें, न बिखरें, और मराठी की विरासत न छोड़ें. यही संदेश हम दोनों की युति के माध्यम से पूरे महाराष्ट्र को दे रहे हैं."

अंत में उन्होंने विश्वास जताते हुए कहा, "मराठी मानुस किसी के बहकावे में नहीं आता और अगर कोई उसकी राह में आता है, तो उसे वापस जाने पर मजबूर कर देता है."