पुणे की जानी-मानी वनस्पति वैज्ञानिक और अबासाहेब गवारे कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. हिमा साने का शुक्रवार को 85 साल की उम्र में निधन हो गया. परिवार के अनुसार उनका निधन उम्र से जुड़ी बीमारियों के कारण हुआ.

बिजली के बिना बिताया जीवन

डॉ. साने ने अपनी जिन्दगी को बेहद सादगी भरे अंदाज में जिया. वह पुणे के बुढ़वार पेठ के तंबाडी जोगेश्वरी मंदिर क्षेत्र में एक जर्जर ‘वाडा’ में रहती थीं और जानबूझकर बिजली का इस्तेमाल नहीं करती थीं. उनके पास रेफ्रिजरेटर, टीवी या कोई आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सुविधा नहीं थी.

वे हमेशा कहती थीं, “भोजन और आश्रय ही मूलभूत जरूरतें हैं, बिजली बाद में आई. मैं इस जीवन की आदत में हूँ और मुझे यह पसंद है.” उनका यह अंदाज जिंदगी जीने का एक अलग ही उदाहरण था.

किताबों और पढ़ाई के प्रति समर्पण

डॉ. साने ने अपने करियर में वनस्पति विज्ञान पढ़ाने को प्राथमिकता दी. उन्होंने शहर के अबासाहेब गवारे कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में लंबे समय तक काम किया और इस दौरान 30 से अधिक पुस्तकें भी लिखीं. उनके लेखन और शिक्षण ने कई छात्रों को प्रेरित किया.

डॉ. साने अपने घर को सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि जानवरों और पक्षियों के लिए भी साझा करती थीं. उन्होंने हमेशा खुद को मालिक नहीं बल्कि देखभालकर्ता के रूप में देखा. वह कहती थीं, “यह जगह कुत्तों, बिल्लियों, नेवले और पक्षियों की है, मैं केवल इसकी देखभाल करती हूँ.”

साधारण जीवन और छोटी खुशियाँ

पर्यावरणविद् सुषमा डेट ने सोशल मीडिया पर लिखा, “हर बार जब मैं उनका सोचती हूँ, मुझे सुकरात की पुरानी कहानी याद आती है. एक बार उन्होंने एथेंस के बाजार में सामान की चकाचौंध को देखा और कहा, ‘कितनी सारी चीज़ें हैं जिनकी मुझे जरूरत नहीं!’”

वे अपने छोटे हरित स्थल में एक टिन की झोपड़ी में रहती थीं और अपने दिन पढ़ाई और लेखन में बिताती थीं. उनके पास संचार का एकमात्र साधन एक साधारण मोबाइल फोन था, जिसे सोलर बैटरी से चार्ज किया जाता था.

अंतिम समय तक रहीं सक्रिय

पर्यावरणविद् सुषमा डेट ने बताया, 80 के दशक में भी डॉ. साने अपने काम में सक्रिय थीं. दो साल पहले उनके साथ हुई मुलाकात में पता चला कि वह अशोक के समय की भारतीय वनस्पति पर किताब लिखने में व्यस्त थीं. उनका यह समर्पण और सादगी भरा जीवन कई लोगों के लिए प्रेरणा रहा.