मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव के नतीजों ने महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में बड़ा संदेश दिया है. जिस बीएमसी को लंबे समय तक ठाकरे परिवार का अभेद्य किला माना जाता रहा, वहीं इस बार न तो उद्धव ठाकरे और न ही राज ठाकरे का प्रभाव निर्णायक साबित हो सका.

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नतीजे सिर्फ बीएमसी तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राज्य की 29 नगर निगमों में भी ठाकरे ब्रदर्स का असर कमजोर दिखा. इसके उलट, बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने शहरी राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत की.

क्यों नहीं चला ‘ठाकरे ब्रांड’ का सिक्का?

इस चुनाव में ठाकरे ब्रदर्स की राजनीति कई मोर्चों पर सवालों के घेरे में रही. सबसे बड़ा मुद्दा भाषा और पहचान की राजनीति को लेकर उठे विवाद रहे. मराठी बनाम गैर-मराठी, उत्तर भारतीय बनाम दक्षिण भारतीय जैसे मुद्दों ने शहरी मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को असहज किया. भाषा के नाम पर बयानबाजी और सड़कों पर टकराव की राजनीति ने मध्यम वर्ग और गैर-मराठी मतदाताओं को ठाकरे खेमे से दूर किया.

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गुंडागर्दी और मारपीट से जुड़े पुराने आरोप भी चुनावी माहौल में भारी पड़े. गैर-मराठियों के साथ कथित हिंसा और आक्रामक राजनीतिक शैली को लेकर यह धारणा बनी कि ठाकरे ब्रदर्स की राजनीति समावेशी नहीं रही. इसका सीधा असर शहरी इलाकों में पड़ा, जहां रोजगार, सुरक्षा और विकास जैसे मुद्दे प्राथमिकता रखते हैं.

ठोस एजेंडे की कमी!

बीएमसी जैसे देश के सबसे समृद्ध नगर निकाय के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक विजन की कमी भी ठाकरे ब्रदर्स के खिलाफ गई. विपक्ष ने यह सवाल उठाया कि शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन, हाउसिंग और बुनियादी सेवाओं पर कोई ठोस रोडमैप क्यों नहीं रखा गया. चुनाव का चेहरा उद्धव और राज ठाकरे बने, लेकिन स्थानीय मुद्दों पर मजबूत योजना सामने नहीं आ सकी.

शिंदे फैक्टर और वोटों में सेंधमारी

असली शिवसेना की लड़ाई में एकनाथ शिंदे गुट का प्रभाव निर्णायक रहा. शिंदे गुट ने खुद को 'असली शिवसेना' के रूप में स्थापित करने में सफलता पाई, जिससे परंपरागत शिवसेना वोट बैंक में सीधा विभाजन हुआ. इसका नुकसान सबसे ज्यादा उद्धव ठाकरे गुट को हुआ, क्योंकि कैडर और जमीनी नेटवर्क में बिखराव साफ दिखा.

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का गठबंधन मराठी अस्मिता को एकजुट करने की कोशिश के तौर पर देखा गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिला. कई क्षेत्रों में यह गठबंधन वोट ट्रांसफर कराने में असफल रहा. उल्टा, यह धारणा बनी कि गठबंधन भावनात्मक मुद्दों पर केंद्रित है, जबकि शहरी मतदाता प्रशासन और विकास को प्राथमिकता दे रहा है.

BMC में ओवैसी कैसे बने गेम चेंजर?

इस चुनाव में AIMIM की मौजूदगी ने मुकाबले को और जटिल बनाया. मुस्लिम वोटों में बिखराव हुआ, जिससे कुछ सीटों पर सीधा फायदा बीजेपी को मिला. हिंदू-मुस्लिम राजनीति के एजेंडे ने मराठी मुद्दे को पीछे धकेल दिया. AIMIM को वोट-कटवा के रूप में देखा गया, जिसके चलते हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण भी तेज हुआ.

अब सवाल- बीजेपी नीत महायुति क्यों जीती?

बीजेपी ने मराठी पहचान को पूरी तरह छोड़े बिना विकास और गवर्नेंस को चुनावी केंद्र में रखा. 'सिर्फ मराठी नहीं, सबकी मुंबई' जैसे संदेश ने गैर-मराठी और मध्यम वर्गीय मतदाताओं में भरोसा पैदा किया. शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर, मेट्रो, सड़कें और प्रशासनिक सुधार बीजेपी के प्रमुख चुनावी मुद्दे रहे.

डबल इंजन सरकार का मुंबई मॉडल

राज्य और केंद्र में सत्ता में होने का फायदा बीजेपी को मिला. डबल इंजन सरकार के तहत मुंबई के लिए चल रही परियोजनाओं को चुनाव में प्रमुखता से रखा गया. इससे यह संदेश गया कि शहर के विकास के लिए स्थिर और समन्वित शासन जरूरी है.

असली शिवसेना का नैरेटिव! कौन फेल कौन पास?

शिंदे गुट के साथ गठबंधन कर बीजेपी ने 'असली शिवसेना' का नैरेटिव मजबूत किया. इसका सीधा असर परंपरागत शिवसेना वोट बैंक पर पड़ा और ठाकरे गुट को नुकसान हुआ.

BMC नतीजों के मायने क्या हैं?

बीएमसी चुनाव में पहली बार बीजेपी को बहुमत मिलना सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है. ठाकरे ब्रदर्स का वर्चस्व खत्म हुआ, मराठी मानुष की राजनीति बैकफायर हुई और गुंडागर्दी वाली छवि को मतदाताओं ने नकारा. इसके साथ ही फडणवीस-शिंदे की जोड़ी मजबूत होकर उभरी.

महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में इस चुनाव के बाद बीजेपी का दबदबा साफ तौर पर मजबूत होता दिखा है. मराठी अस्मिता की राजनीति पर हिंदुत्व और विकास का नैरेटिव भारी पड़ा, जिससे बीजेपी को व्यापक समर्थन मिला. मुंबई जैसे महानगर में ठाकरे फैक्टर अब निर्णायक साबित नहीं हो सका, वहीं उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का गठबंधन भी मतदाताओं को साधने में असफल रहा. उत्तर भारतीय वोट बैंक इस बार संगठित होकर बीजेपी के साथ गया, जिसने कई सीटों पर परिणामों को प्रभावित किया. कुल मिलाकर शहरी मतदाता ने आक्रक, टकराव और गुंडागर्दी से जुड़ी राजनीति को नकारते हुए स्थिरता, विकास और प्रशासनिक भरोसे को तरजीह दी.

बीएमसी के साथ पुणे, ठाणे, नागपुर और नासिक जैसे प्रमुख नगर निगमों में बीजेपी की बढ़त ने स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में संतुलन बदल चुका है.