मुंबई की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस ने बड़ा राजनीतिक दांव खेल दिया है. कांग्रेस ने इस बार शिवसेना UBT से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का मन बना लिया है. पार्टी को भरोसा है कि मुंबई के दलित, मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के मतदाता एक बार फिर उसके साथ खड़े होंगे.
1992 की जीत और फिर सत्ता से बेदखली
कांग्रेस ने आखिरी बार 1992 में बीएमसी का चुनाव जीता था. उस समय पार्टी की कमान दिग्गज नेता मुरली देवड़ा के हाथ में थी और गठबंधन रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) के साथ था. तब शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी अलग-अलग मैदान में थीं.
हालांकि, चुनाव जीतने के बावजूद कांग्रेस पूरे 5 साल सत्ता में नहीं रह सकी. कार्यकाल पूरा होने से पहले ही अंदरूनी तोड़-फोड़ के चलते शिवसेना का महापौर बन गया और 1997 से लगातार बीएमसी पर शिवसेना का कब्जा बना रहा.
कांग्रेस के इस फैसले के पीछे हाल के लोकसभा और विधानसभा चुनावों का अनुभव भी अहम वजह माना जा रहा है. 2024 के चुनावों में शिवसेना (यूबीटी) के साथ गठबंधन के दौरान सीट बंटवारे में कांग्रेस को काफी नुकसान उठाना पड़ा.
लोकसभा में पार्टी को मुंबई से सिर्फ दो सीटें मिलीं. इनमें से भी उत्तर-मध्य मुंबई की एक सीट बड़ी मुश्किल से कांग्रेस अध्यक्ष वर्षा गायकवाड़ जीत सकीं. विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को लगातार दबाव झेलना पड़ा.
राहुल गांधी फैक्टर और नया भरोसा
मुंबई कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि मौजूदा दौर में दलित, वंचित और अल्पसंख्यक वर्ग को राहुल गांधी ही भाजपा के मुकाबले सबसे मजबूत विकल्प नजर आते हैं. यही वजह है कि कांग्रेस को भरोसा है कि अगर वह बीएमसी चुनाव अकेले लड़ती है, तो उसका पारंपरिक वोट बैंक फिर से उसके साथ आएगा.
कांग्रेस जानती है कि मुस्लिम मतदाता पहले भाजपा को सीधी टक्कर देने के कारण उद्धव ठाकरे के साथ गए थे, लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस भी उस समर्थन की बड़ी वजह थी. अब पार्टी मान रही है कि अकेले मैदान में उतरकर वह बीएमसी चुनाव में तीसरा मजबूत पक्ष बन सकती है.