कहते हैं कि अगर हौसला बुलंद हो और अपनों की दुआएं साथ हों, तो मौत के मुहाने से भी जिंदगी लौट आती है. छिंदवाड़ा जिले के परासिया के जाटाछापर निवासी 5 वर्षीय मासूम कुणाल ने इस कहावत को सच कर दिखाया है. जानलेवा कफ सिरप 'कोल्ड्रिफ' के जहर से अपनी सांसें बचाने की जद्दोजहद कर रहा कुणाल 115 दिनों के लंबे और दर्दनाक उपचार के बाद आखिरकार सोमवार रात अपने घर लौट आया. कुणाल की किलकारियों ने एक बार फिर घर में खुशियों की दस्तक दी.

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विजडम स्कूल का छात्र कुणाल उन बदनसीब बच्चों में शामिल था, जो अगस्त माह में घातक कफ सिरप 'कोल्ड्रिफ' का शिकार हुए थे. इस जहरीली दवा ने जहां जिले के 27 परिवारों के चिराग बुझा दिए, वहीं कुणाल की किडनियों ने भी काम करना बंद कर दिया था.

24 अगस्त को कुणाल की तबीयत बिगड़ी और 31 अगस्त को उसे गंभीर हालत में नागपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया. इसके बाद एम्स (AIIMS) में उसका लंबा इलाज चला, जहां वह कई हफ्तों तक डायलिसिस और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रहा.

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खुशियों भरी घर वापसी और दुआओं का असर

कुणाल की सलामती के लिए पूरा परासिया दुआएं कर रहा था. अस्पताल के बिस्तरों पर महीनों गुजारने के बाद जब मंगलवार को वह अपने खिलौनों के बीच पहुंचा, तो माता-पिता की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े. पिता टिक्कू यदुवंशी ने बताया कि डॉक्टरों की मेहनत और लोगों की दुआओं ने उनके लाडले को नई जिंदगी दी है. हालांकि, लंबे उपचार और भारी दवाइयों के असर के कारण फिलहाल कुणाल को आंखों से धुंधला दिखने और पैरों में कमजोरी की समस्या है, लेकिन डॉक्टरों ने आश्वासन दिया है कि समय के साथ इसमें सुधार होगा.

एक डरावने आंकड़े के बीच उम्मीद की किरण

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद पहलू यह है कि जहरीले सिरप के प्रभाव से कुल 30 बच्चे गंभीर हुए थे, जिनमें से 27 की असमय मृत्यु हो गई. कुणाल उन केवल तीन बच्चों में से एक है, जो मौत के मुंह से सुरक्षित बाहर निकल सके. इससे पहले सोनापीपरी की एक बालिका और रिधोरा का एक बालक भी स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं.

कुणाल की यह वापसी न केवल उसके परिवार के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक उम्मीद की किरण है कि हार न मानने का जज्बा बड़े से बड़े संकट को टाल सकता है.