झारखंड में प्राकृतिक और मानव जनित आपदाओं से होने वाली मौतों का आंकड़ा कम करने के लिए राज्य सरकार अब पूरी तरह से 'एक्शन मोड' में आ गई है. आकाशीय बिजली (वज्रपात) गिरने, डूबने, सर्पदंश (सांप के काटने) और सड़क दुर्घटनाओं जैसी घटनाओं में हर साल होने वाली भारी जनहानि को रोकने के लिए राज्य सरकार जल्द ही एक व्यापक कार्ययोजना लागू करने जा रही है. इसके तहत राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने एक विशेष और एकीकृत ‘झारखंड आपदा राहत प्रबंधन’ (Jharkhand Disaster Relief Management) पोर्टल विकसित किया है.
आपदा प्रबंधन विभाग के संयुक्त सचिव राकेश कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि देश भर में कुल 26 प्रकार की आपदाएं चिन्हित हैं, लेकिन झारखंड में सबसे ज्यादा जनहानि इन्ही चार प्रमुख आपदाओं (बिजली गिरना, डूबना, सर्पदंश और सड़क हादसे) के कारण होती है. इस नए पोर्टल को फिलहाल एक प्रायोगिक (पायलट) प्रोजेक्ट के तौर पर राज्य के दो प्रमुख जिलों— धनबाद और बोकारो में शुरू किया गया है. इन दोनों जिलों में प्रयोग सफल होने के बाद इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरे राज्य में लागू कर दिया जाएगा.
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आंकड़े डराने वाले: हर साल जा रहीं हजारों जानें
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में इन आपदाओं से मौत का ग्राफ काफी ऊंचा है. पिछले वर्ष केवल 1 मई से 31 जुलाई के बीच राज्य में 431 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी. इनमें सबसे ज्यादा 180 मौतें आकाशीय बिजली गिरने से, 161 डूबने से और 80 मौतें सर्पदंश से हुई थीं. इसमें सड़क हादसों के आंकड़े शामिल नहीं हैं. अगर सड़क दुर्घटनाओं की बात करें, तो राज्य में हर साल औसतन 3,000 लोग अपनी जान गंवाते हैं. इसके अलावा, साल 2022 से अप्रैल 2026 तक सर्पदंश के 9,438 मामले सामने आ चुके हैं, जबकि इस साल अब तक बिजली गिरने से करीब 100 लोग दम तोड़ चुके हैं.
पोर्टल पर मिलेगी सटीक जानकारी, आसान होगा मुआवजा
अधिकारी राकेश कुमार ने बताया कि इस पोर्टल पर संवेदनशील स्थानों, बचाव की सावधानियों और जन-जागरूकता से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी एक ही मंच पर उपलब्ध होगी. डूबने की घटनाओं वाले संवेदनशील जलस्रोतों और सड़क दुर्घटनाओं वाले 'ब्लैक स्पॉट्स' की पहचान कर उन्हें भौगोलिक निर्देशांक (Geo-tagging) के साथ पोर्टल पर डाला जा रहा है. सबसे बड़ी राहत यह होगी कि पीड़ित परिवार इसी पोर्टल के माध्यम से मुआवजे के लिए सीधा दावा (Claim) कर सकेंगे, जिससे सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की प्रक्रिया बेहद आसान और पारदर्शी हो जाएगी.
'गोल्डन आवर' में इलाज और 2030 का लक्ष्य
इस पहल में स्वास्थ्य विभाग भी अहम भूमिका निभा रहा है. झारखंड राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के निदेशक शशि प्रकाश झा ने बताया कि सभी सिविल सर्जनों को कड़े निर्देश दिए गए हैं कि वे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के 'राष्ट्रीय सर्पदंश प्रबंधन प्रोटोकॉल' को सख्ती से लागू करें. एनएचएम की टीम लोगों को जागरूक करेगी कि सांप काटने के बाद इलाज के लिए मिलने वाले शुरुआती समय यानी 'गोल्डन ऑवर' (Golden Hour) को बिल्कुल न गंवाएं और तुरंत अस्पताल पहुंचें. गौरतलब है कि राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र की कार्ययोजना का मुख्य लक्ष्य साल 2030 तक सर्पदंश से होने वाली मौतों और दिव्यांगता के मामलों में 50 प्रतिशत तक की कमी लाना है.
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