पूर्व हुर्रियत चेयरमैन और मीरवाइज़-ए-कश्मीर उमर फारूक ने भारत और पाकिस्तान के बीच रुकी हुई शांति वार्ता को फिर से शुरू करने और सभी विवादों को बातचीत के ज़रिए सुलझाने की पुरजोर अपील की है. श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में 'यौम-ए-आशूरा' के मौके पर जुमे की नमाज़ के दौरान उपदेश देते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े से बड़े विवादों का समाधान युद्ध से नहीं, बल्कि कूटनीति और समझदारी से ही संभव है.

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हाल की वैश्विक घटनाओं का ज़िक्र करते हुए मीरवाइज़ ने कहा कि ईरान के साथ अमेरिका और इज़राइल के हालिया टकराव से हमें यह याद रखना चाहिए कि सैन्य ताकत की अपनी सीमाएँ होती हैं. उन्होंने कहा, "युद्ध हालात बदल सकते हैं और भारी तबाही मचा सकते हैं, लेकिन स्थायी शांति और लंबे समय तक चलने वाले समाधान के लिए अंततः बातचीत की ही ज़रूरत होती है."

उन्होंने पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता की तारीफ करते हुए कहा कि कूटनीति किसी पक्ष की कमजोरी नहीं, बल्कि सच्चाई को स्वीकार करना है. यह भारत और पाकिस्तान समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक बड़ा सबक है.

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दक्षिण एशिया का अपार नुकसान

कश्मीर विवाद और भारत-पाक के बीच जारी तनाव पर बात करते हुए मीरवाइज़ ने कहा कि हमारे क्षेत्र में दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी रहती है. यहाँ अपार सांस्कृतिक विरासत और मानव संसाधन हैं, लेकिन दशकों के राजनीतिक तनाव और अविश्वास ने इस क्षेत्र के लोगों को इसका फायदा उठाने से रोक रखा है. जनता मानसिक और आर्थिक रूप से भारी तकलीफ झेल रही है.

PM मोदी से शांति वार्ता शुरू करने की अपील

स्थायी शांति की उम्मीद जताते हुए मीरवाइज़ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज़ाद भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले नेताओं में से एक बन गए हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि पीएम मोदी उसी जोश के साथ बातचीत की प्रक्रिया फिर से शुरू करेंगे जैसा पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और एल.के. आडवाणी ने किया था. उन्होंने कहा, "शांति और कूटनीति का रास्ता धीमा हो सकता है और इसमें धैर्य की ज़रूरत होती है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के लोग शांति के इसी रास्ते पर चलने में विश्वास रखते हैं."

कर्बला और पिता की विरासत का ज़िक्र

इमाम हुसैन (RA) की शहादत (कर्बला) का ज़िक्र करते हुए मीरवाइज़ उमर ने कहा कि वे भी युद्ध नहीं चाहते थे; उनका भी यही सिद्धांत था कि मतभेदों को सच्चाई और बातचीत से सुलझाया जाए.

अपने पिता शहीद मीरवाइज़ मौलवी फारूक को याद करते हुए उन्होंने कहा कि 1990 में उनकी हत्या के बाद उन्हें यही सिद्धांत विरासत में मिले. उन्होंने कहा कि अवामी एक्शन कमेटी और ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ज़रिए पिछले 36 सालों से उन्होंने हर मुश्किल का सामना करते हुए इसी शांति और बातचीत के सिद्धांत को हमेशा बनाए रखा है.

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