मीरवाइज़-ए-कश्मीर मौलवी मुहम्मद उमर फारूक ने घोषणा की है कि इस वर्ष ईद-उल-अज़हा की नमाज़ बुधवार, 27 मई 2026 को श्रीनगर के ऐतिहासिक ईदगाह में अदा की जाएगी. कार्यक्रम का विस्तृत ब्योरा जल्द जारी किया जाएगा. हालांकि, इस घोषणा के बावजूद यह अभी अनिश्चित है कि प्रशासन इसकी अनुमति देगा या नहीं, क्योंकि सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पिछले कई वर्षों से ईदगाह में नमाज अदा करने पर रोक लगी हुई है. शुक्रवार (22 मई) को श्रीनगर की ऐतिहासिक जामिया मस्जिद में नमाज के दौरान अपने संबोधन में मीरवाइज ने कई अहम मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखी.

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नजरबंदी और प्रशासन पर कड़ा प्रहार

मीरवाइज उमर ने 21 मई को उन्हें नजरबंद किए जाने को लेकर प्रशासन की कड़ी आलोचना की. उन्होंने निराशा व्यक्त करते हुए कहा, "आज हमारे दिल दर्द से भरे हुए हैं क्योंकि हमें एक बार फिर अपने प्रिय नेताओं और शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए 'मज़ार-ए-शुहदा' (शहीदों के कब्रिस्तान) जाने की अनुमति नहीं दी गई."

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उन्होंने याद दिलाया कि 'शहीद-ए-मिल्लत' मीरवाइज मौलवी मुहम्मद फ़ारूक की शहादत और 21 मई 1990 के हवाल नरसंहार को 36 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कश्मीरियों के दिलों में वे ज़ख्म आज भी ताज़ा हैं.

कश्मीर मुद्दे पर भारत-पाकिस्तान संवाद पर जोर

कश्मीर विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में मीरवाइज़ ने भारत और पाकिस्तान के बीच सार्थक बातचीत की पुरज़ोर वकालत की. उन्होंने कहा कि कश्मीर संघर्ष, जो दोनों देशों के लिए प्रभुत्व का मसला बना हुआ है, अंततः कश्मीर के लोगों की कीमत पर लड़ा जा रहा है.

अपने संघर्ष का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, ''उनका राजनीतिक संघर्ष कश्मीरियों की आवाज़ सुने जाने के लिए है. वे चाहते हैं कि कश्मीरियों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान हो और उनकी गरिमा स्थापित हो. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए वादे कभी पूरे नहीं हुए और पड़ोसी देशों के बीच हुए युद्धों से कोई भी ठोस समाधान नहीं निकल सका.

पिता के पदचिह्नों पर चलने का संकल्प

अपने पिता के विचारों को याद करते हुए मीरवाइज़ ने कहा कि उनके पिता शांति के प्रबल समर्थक थे और हिंसा या बल-प्रयोग को कमज़ोरी की निशानी मानते थे. उन्होंने कहा, "मेरे पिता ने हमेशा देशों, समुदायों और संप्रदायों के बीच बातचीत को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सबसे बेहतरीन ज़रिया माना था. आज मैं भी उसी समाधान, शांति, भाईचारे और संयम के रास्ते पर चल रहा हूँ. मैं अल्लाह से दुआ करता हूँ कि मैं अपने शहीद पिता के उन सपनों को पूरा कर सकूं, जो उन्होंने अपने लोगों के लिए देखे थे—एक ऐसा समाज जो शांति, खुशहाली और सच्ची लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत फले-फूले.

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