जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में स्थानीय लोगों के लिए पर्यटक ही कमाई का सबसे बड़ा साधन हैं. पर्यटकों की संख्या बढ़ने पर इनकी कमाई बढ़ती है और संख्या घटने पर रोजी-रोटी का संकट पैदा हो जाता है. पहलगाम की बैसरन घाटी में अप्रैल 2025 में हुए आतंकी हमले के बाद से न सिर्फ पहलगाम, बल्कि श्रीनगर तक के कारोबार पर गहरा असर पड़ा है.

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यही वजह है कि यहां के हर कारोबारी को अमरनाथ यात्रा का बेसब्री से इंतजार रहता है. इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं, जो बाबा बर्फानी के दर्शन के साथ-साथ यहां की वादियों में घूमते हैं और खरीदारी करते हैं. इससे स्थानीय कारोबार को बड़ा बूस्ट मिलता है.

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पोनी कारोबारियों पर पड़ा था सबसे ज्यादा असर

इस आतंकी हमले का सबसे ज्यादा असर पोनी (खच्चर) और घोड़े के कारोबार पर पड़ा, जिनकी रोजी-रोटी पूरी तरह से टूरिस्ट पर निर्भर है. इसलिए इन कारोबारियों को अमरनाथ यात्रा से बड़ी उम्मीदें हैं. एबीपी न्यूज़ की टीम ने उन पोनी संचालकों से बात की, जो पिछले कई दशकों से इसी के जरिए अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और घर का खर्च चला रहे हैं. इनके पास कमाई का कोई और जरिया नहीं है.

दरअसल, श्रीनगर से करीब 95 किमी दूर पहलगाम की बैसरन घाटी में 22 अप्रैल 2025 को आतंकियों ने 26 लोगों को गोलियों से भून दिया था. तब से यह घाटी बंद है और टूरिस्ट्स की संख्या भी काफी कम हो गई है. इसका सीधा असर पोनी कारोबार पर पड़ा और नौबत यहां तक आ गई कि घर का चूल्हा जलाना मुश्किल हो गया.

श्रद्धालुओं से जगी नई आस

एबीपी न्यूज़ से बातचीत के दौरान पोनी कारोबारियों का दर्द छलक पड़ा. उन्होंने कहा, "अमरनाथ यात्रा हमारी बड़ी उम्मीद है. जब से आतंकी हमला हुआ, कारोबार पूरी तरह ठप हो गया था. बैसरन घाटी और कई टूरिस्ट प्लेस बंद होने से टूरिस्ट न के बराबर आ रहे थे. लेकिन अमरनाथ यात्रा के लिए आए श्रद्धालु हमारे लिए संजीवनी की तरह हैं. दर्शन के बाद वे घूमने जाते हैं, जिससे हमारा काम चल पड़ता है."

कारोबारियों ने बताया कि कमाई कम हो रही है (लोग हजार-पंद्रह सौ में ही पोनी ले जाते हैं), लेकिन फिर भी गुजारा हो रहा है. वहीं, पोनी की सवारी करते हुए श्रद्धालु भी काफी खुश नजर आए. उनका कहना है कि बाबा के दर्शन के साथ-साथ परिवार के साथ यहां घूमना बहुत अच्छा लग रहा है.

कुल मिलाकर, यह कहना गलत नहीं होगा कि अमरनाथ यात्रा सिर्फ लोगों की आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि कश्मीर के स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण साधन भी बन गई है.

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