हिमाचल प्रदेश के शिमला में करीब 21 हजार मिड-डे मील वर्कर अपनी लंबित मांगों को लेकर 22 जून को राज्यव्यापी हड़ताल पर रहे. अपनी मांगों के समर्थन में प्रदेशभर से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता राजधानी शिमला पहुंचे और सचिवालय घेराव व महारैली के जरिए सरकार के समक्ष अपनी आवाज बुलंद की. इस आंदोलन के चलते प्रदेश के 8 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए दोपहर के भोजन की व्यवस्था प्रभावित हुई.

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कर्मचारियों का सरकार पर मांगों को अनदेखी का आरोप 

मिड-डे मील वर्कर्स यूनियन के मुताबिक, वर्षों से उनकी मांगों की अनदेखी की जा रही है. कार्यकर्ताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार ने पिछले करीब 17 वर्षों में उनके मानदेय में कोई बढ़ोतरी नहीं की है. इसी के चलते वे हरियाणा की तर्ज पर प्रति माह 7 हजार रुपये वेतन देने की मांग कर रहे हैं. अभी इनको पांच हजार प्रति माह मानदेय मिल रहा है. साथ ही कहा मानदेय भी उनको समय पर नहीं मिल रहा है.

कर्मचारियों ने सरकार से मांगों को लेकर की अपील

यूनियन नेताओं के अनुसार, वे पूरे वर्ष स्कूलों में सेवाएं देते हैं, लेकिन उन्हें केवल 10 महीने का ही मानदेय दिया जाता है. उनकी मांग है कि सभी मिड-डे मील वर्करों को 12 महीने का वेतन सुनिश्चित किया जाए. इसके अलावा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की तरह वार्षिक अवकाश, चिकित्सा सुविधाएं और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ भी दिए जाएं. 

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हाला कि हड़ताली कर्मचारियों ने रिटायरमेंट के बाद पेंशन और ग्रेच्युटी की व्यवस्था लागू करने की भी मांग उठाई है, कहा वर्षों तक सेवा देने के बावजूद उन्हें किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है. साथ ही यूनियन ने मिड-डे मील योजना का दायरा प्लस-टू स्तर तक बढ़ाने और सभी वर्करों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने की मांग भी दोहराई. उन्होंने साफ किया कि शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद उन्हें सम्मानजनक वेतन और सुविधाएं नहीं मिल रही हैं.

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