जमीयत उलमा-ए-हिंद का दो दिवसीय वार्षिक अधिवेशन शुक्रवार को हरियाणा के नूंह जिले के मेवात में शुरू हुआ. डीएलएफ स्प्रिंगफील्ड, सहसौला पट्टी, पीपाका में हो रहे इस अधिवेशन की शुरुआत संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने ध्वजारोहण करके की. इसमें देशभर से करीब 2,000 सदस्य, उलेमा और कई प्रमुख हस्तियां शामिल हो रही हैं.
अधिवेशन के पहले सत्र में मस्जिदों और दूसरे धार्मिक स्थलों पर बुलडोजर कार्रवाई रोकने, मदरसों को परेशान किए जाने पर रोक लगाने और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के विरोध में प्रस्ताव पास किए गए. जमीयत ने केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं से मांग की कि धार्मिक स्थलों और मदरसों के अधिकारों की रक्षा की जाए.
यह भी पढ़ें: पानीपत: हाईटेंशन तार से 11 साल के बच्चे की मौत, परिवार में मचा कोहराम
धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई को लेकर चिंता
जमीयत ने देश के अलग-अलग हिस्सों में मस्जिदों, ईदगाहों, दरगाहों और दूसरे धार्मिक स्थलों पर हो रही कार्रवाई को लेकर चिंता जताई. संगठन का कहना है कि किसी भी मस्जिद या धार्मिक स्थल को गिराने से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए और संबंधित पक्ष को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए.
प्रस्ताव में संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का जिक्र करते हुए कहा गया कि धार्मिक स्वतंत्रता हर नागरिक का अधिकार है. जमीयत ने प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 का हवाला देते हुए धार्मिक स्थलों की मौजूदा स्थिति बनाए रखने की जरूरत पर भी जोर दिया.संगठन ने संभल की ऐतिहासिक जामा मस्जिद का मुद्दा उठाते हुए कहा कि धार्मिक स्थलों के सर्वे से जुड़े आदेशों के बाद पैदा हुई स्थिति का असर शांति और कानून-व्यवस्था पर पड़ा है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कराने की मांग
जमीयत ने केंद्र सरकार और उच्च न्यायपालिका से सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर 2024 के अंतरिम आदेश का पालन सुनिश्चित करने की मांग की. साथ ही कहा कि 1991 के कानून के खिलाफ आने वाले नए दावों को शुरुआती स्तर पर ही खारिज किया जाना चाहिए. अधिवेशन में फैसला लिया गया कि जमीयत की सभी प्रांतीय, जिला और तहसील इकाइयां केंद्रीय संगठन की ओर से तय तारीख और समय पर अपने-अपने इलाके के अधिकारियों को ज्ञापन सौंपेंगी.
मस्जिद के कागजाद सुधारने की निर्देश
जमीयत ने अपनी इकाइयों से कहा है कि वे मस्जिदों की प्रबंध समितियों की मदद करें और उनकी जमीन से जुड़े दस्तावेजों को दुरुस्त कराएं. इसमें खसरा-खतौनी, नगरपालिका टैक्स की रसीदें और दूसरे जरूरी कानूनी कागजात शामिल हैं. संगठन ने यह काम अगले छह महीने में पूरा कराने का निर्देश दिया है. जमीयत की मांग है कि उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना मस्जिदों को गिराने की कार्रवाई रोकी जाए और नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई हो.
मदरसों को लेकर गलत प्रचार पर आपत्ति
अधिवेशन में मदरसों से जुड़े प्रस्ताव में मान्यता और जांच के नाम पर उन्हें परेशान किए जाने और उनके खिलाफ कथित तौर पर गलत प्रचार किए जाने पर चिंता जताई गई. जमीयत ने केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं से ऐसी कार्रवाइयां रोकने की मांग की. संगठन का कहना है कि संविधान के तहत मदरसों को मिले अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को बेवजह विवादों में नहीं घसीटना चाहिए.
हालांकि, जमीयत ने मदरसों के जिम्मेदार लोगों को भी अपने संस्थानों के दस्तावेज दुरुस्त रखने की सलाह दी है. संगठन ने जमीन के कागजात, स्वीकृत नक्शे, छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थियों की पहचान से जुड़े रिकॉर्ड और वित्तीय खातों का ऑडिट पारदर्शी तरीके से तैयार रखने को कहा है. अधिवेशन में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर भी प्रस्ताव पारित किया गया. जमीयत ने यूसीसी को उसके मौजूदा स्वरूप में खारिज करते हुए इसे भेदभावपूर्ण बताया.
इससे पहले 29 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित जमीयत उलमा-ए-हिंद के केंद्रीय कार्यालय मदनी हॉल में मजलिस-ए-आमिला की बैठक हुई थी. इसमें वार्षिक अधिवेशन में रखे जाने वाले प्रस्तावों पर चर्चा की गई थी. बैठक में मंजूर प्रस्तावों को शुक्रवार को अधिवेशन में पेश किया गया.
अधिवेशन 31 अक्टूबर को दोपहर तक चलेगा. इसमें देश के मौजूदा हालात और मुसलमानों से जुड़े सामाजिक, शैक्षिक, राष्ट्रीय और संगठनात्मक मुद्दों पर भी चर्चा होगी। जमीयत के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी का विस्तृत संबोधन भी कार्यक्रम का अहम हिस्सा होगा.
यह भी पढ़ें: हरियाणा: चुनाव आयोग ने SIR की तारीखों में किया बदलाव, अब 20 नवंबर तक मौका
